जिस दिन निकलना था ठण्ड अपने चरम पर थी । निश्चित जगह पर खड़े होकर बस का इंतज़ार करते घंटे हो गए । बस का कहीं अता-पता नहीं था । बस आपरेटर को कॉल किया तो उसने ड्राइवर का नंबर दिया । ड्राइवर से बड़ी मुश्किल से बात हो पाई तो पता चला कि बस बस्ती जिले में खराब हो गयी है और बन रही सो आने में अभी एक डेढ़ घंटे लगेंगे । एक तो ठण्ड और बर्फीली हवा, दूसरे कहीं बैठने की जगह भी नहीं तो खीझ लग रही थी लेकिन क्या करती वापस घर जाने का भी साधन नहीं था कि लौट जाती क्योंकि जो पहुँचाने आया उसे भी घर भेज चुकी थी । इतनी ठण्ड में उसे दुबारा बुलाने की इच्छा नही हुई ।
इस तरह की बसों के रुकने का स्थान शहर के बाहरी हिस्से में बाईपास शुरू होते ही होता है । मेरी ही तरह और भी कई लोग अपनी-अपनी बसों के इंतज़ार में खड़े थे । कुछ सड़क पर बने डिवाइडर पर ही जगह बनाकर बैठ गए थे । इधर उधर देख ही रही थी तभी पास ही एक चाय के ठेले वाले ने अपनी इकलौती टूटी कुर्सी मेरी ओर खिसकाते हुए कहा कि “बैठ जाइए ।” वह अपनी दुकान लगभग बढ़ा चुका था और अब दिनभर की बिक्री के बाद जमा हुए खाली गिलास और दोने वगैरह जलाने जा रहा था । काफी देर से खड़ी-खड़ी थक गयी थी तो कुर्सी पर बैठकर गहरी सांस ली मैंने ।
कभी-कभी भारत वर्ष में जन्म लेने पर इतराने का मन होता है जहाँ कलियुग में भी इतनी सहृदयता बची है कि लोग अपना आराम छोड़कर दूसरे के बारे में सोचते हैं । कुर्सी टूटी जरूर थी लेकिन उसके चारो पैर सुरक्षित थे और बैठने की जगह भी ठीक थी बस पीछे का हिस्सा जहाँ पीठ टिकाते हैं वही टूटा था । खैर शहर के बाहर, सड़क किनारे बैठने का ठिकाना मिला ये ही क्या कम था ।
गिलास और दोने का कूड़ा जलते ही कई लोग सिमटकर वहीँ आ गए । हालांकि उसमें धुआं अधिक आग कम थी लेकिन लोगों ने उसे घेर रखा था । मुझे बैठे- बैठे बीरबल की खिचड़ी वाली कहानी याद आ गयी जिसमें वो बूढ़ा व्यक्ति दूर गाँव में जलती टिमटिमाती लौ को देखते, उसी के सहारे रात भर ठन्डे पानी में खड़ा रहा । मैं उस धुएं वाली आग से दूर थी लेकिन आग को देखने से भी जैसे गर्मी मिल रही थी या सर्दी से ध्यान हट गया था ।
पास ही एक २३-२४ साल की लड़की भी सामान सहित खड़ी थी । एक बार इच्छा हुई उससे पूछूं कि उसे कहाँ जाना है ? क्या पता उसी बस में जा रही हो तो साथ हो जाएगा । लेकिन उसके चेहरे पर पसरी अजनबीयत को देखकर ये विचार त्याग दिया । अच्छा हुआ कि थर्मस में चाय ले आई थी तो गिलास में चाय निकाली और सुड़कने लगी ।
दो घंटे कड़कती ठण्ड में हाई वे के किनारे इंतज़ार के बाद अंततः बस आ ही गयी । मोटे जैकेट में भी हवा सुई सी चुभ रही थी । बस आते ही अपनी सीट ली । सीट के नीचे खाली जगह में सूटकेस रखा और खाने पीने के सामान तथा छोटी-मोटी जरूरत की चीजों वाला पिट्ठू बैग सीट पर ही रख लिया । सीट स्लीपर थी और खासी लम्बी चौड़ी तथा आरामदायक । भीतर जाकर मैंने केबिन अन्दर से बंद किया, तकिये पर सर रखा और आँखें मूंदकर गहरी सांस ली । बस के वातानुकूलित माहौल और बाहर की ठण्ड के बीच धीरे धीरे शरीर को अनुकूल होने दिया और मन को भी जो पिछले दो महीने से, जाने और न जा पाने की कशमकश में शारीरिक, मानसिक तैयारियों से जूझता रहा था । क्या सचमुच इतना आसान था, बस निकल पड़ना अपने मनोमय संसार में यूँ ही विचरने को ।
काम से घर आकर थोड़ी देर बाद अगर पुरुष ये कहते हैं कि थोड़ी देर को बाहर जा रहा घूमने तो कितनी सामान्य सी बात लगती है और जब एक औरत यही बात कहे तो कितनी विचित्र । उसके सामने दुनिया भर के सवालों की फेहरिस्त कि क्या जरूरत बाहर जाने की ?, क्या लाना है बता दो मैं लेता आऊंगा, ये औरतों के घर से बिना काम बाहर जाने का समय थोड़ी है, शाम को चौराहों पर वैसे भी लफंगे खड़े रहते । अब उनसे कौन पूछे कि जब बाहर सब लफंगे तो आप भला उनकी संख्या में इजाफा करने क्यों जा रहे हैं ? लेकिन वो बड़े बुजुर्ग कहते हैं न कि समझदार औरतें गृह-कलह टालती है भले खुद मानसिक त्रास से गुजरना पड़े ।
यहाँ इस बात की चर्चा करने की मंशा कौन सही या कौन गलत का आकलन करना नहीं बल्कि उन महिलाओं में अपने अस्तित्व के प्रति, अपने स्वाभिमान के प्रति और अपनी इच्छाओं को सम्मान देने का भाव जगाने का प्रयास भर है जिन्हें औरत होने से शिकायत होती है । खैर फिलहाल तो अपनी यात्रा पर आती हूँ ।
अचानक बस झटके से रुकी तो मेरी तन्द्रा टूटी । पर्दा हटाकर देखा तो बाराबंकी टोल प्लाजा आ गया था यानि मैं लगभग एक डेढ़ घंटे में काफी पीछे हो आई थी । भूख लग रही थी तो साथ लाये टिफ़िन से थोड़ा सा कुछ खाया, पानी पीकर केबिन अन्दर से बंद कर निश्चित लेट गयी और फिर करवट बदलते-बदलते आँख लग ही गयी । लोगों के उतरने की चहल-पहल से फिर नींद टूटी तो घड़ी देखी, सुबह के पांच बजे थे और बस स्टैंड था दिल्ली ।
दिल्ली ? दिमाग घूम गया । ये बस दिल्ली होकर जाएगी यानि कम से कम ५ घंटे अतिरिक्त । हद है यार, ये डिटेल तो देखी ही नहीं टिकट बुक करते समय । ये इस सफ़र का पहला सबक था तो आगे से टिकट बुक करते समय उसका रूट भी देखना होगा अच्छी तरह । खैर अब चारा भी क्या था सो फिर से कम्बल में सिर डाला और लेट गयी । किसी के केबिन का दरवाजा खटखटाने से जब आँख खुली तो देखा बस एक ढाबे पर रुकी थी । सुबह के ८ बजे थे और बस वहाँ ३० मिनट रुकने वाली थी । मतलब था कि जिसे फैश होना हो या चाय नाश्ता करना हो तो कर ले ।
हाई वे के किनारे से लगा यह ढाबा तो काफी लम्बा चौड़ा था लेकिन वाशरूम बहुत गंदे । अब पता चल रहा था कि बस में कौन कौन सी सवारियां हैं । रात में तो बस अपनी सीट पर जाकर कुछ देख ही नहीं पायी थी । कुछ लोग सड़क पार कर सामने पेट्रोल पंप का वाशरूम इस्तेमाल के लिए गए । कुछ महिलायें भी जा रही थीं तो मैं भी वहीँ चली गयी । वापसी में उसी के पास वाली चाय की टपरी से चाय भी लेती हुई आई । हालांकि पहली बार एकदम अकेले इतनी लम्बी यात्रा पर थी वो भी बस से तो मन में एक धुकधुकी सी भी हो रही थी कि कहीं मेरे चढ़ने से पहले बस चल न पड़े । बाहर ही खड़े होकर चाय पीते हुए सुबह की ताज़ी हवा के साथ ही सुखद सी आज़ादी महसूस की ।
क्या चाहिए होता है मन को ? बचपन में जल्दी बड़े होने का कितना उतावलापन होता है । लड़कियों में मां की साड़ी पहनने, बिंदी लगाने, उन्ही की सैंडिल पहनकर चलने का और लड़कों में पिता के जूते पहनने, उनकी शेविंग किट इस्तेमाल करने, उनकी शर्ट पहनकर उनके जैसा दिखने का चाव । बड़े होने पर नौकरी पाने का । नौकरी मिली या नहीं मिली तो भी शादी, फिर बच्चे, फिर अपना मकान और उसे सजाना-संवारना फिर बैंक बैलेंस और फिर ? ये फिर ही तो हमें चैन से बैठने नहीं देता । जिस दिन इस फिर-फिर से आजादी मिल जाए वही सच्चा सुख हो शायद ।
मुझे तो लगता है सबके साथ यही होता होगा । हमारा सामजिक ढांचा ऐसा है कि लड़कों के लिए वैसे तो कोई खास नियम नहीं, आज़ादी रहती है लेकिन फिर भी सामाजिक भागीदारी और पारिवारिक जिम्मेदारी को लेकर उनपर जो मानसिक दबाव होता है जाने क्यों मुझे उनसे सहानुभूति सी होती है ।
वैसे भी पुरुष हो या स्त्रियां, यहाँ कंडीशनिंग वाली बात दोनों पर लागू होती है कि एक चक्र की तरह जीवन को एक निश्चित खांचे में फिट कर चलाने या विशेष समर्थ न होने पर स्वतः चलने देने का जो मन्त्र हमारे कानों में बचपन से फूंका जाता है उसका असर जाते-जाते जाता है । अधिकतर का तो मरते दम तक नहीं जाता । लड़की है तो उसे घर के काम काज सीखने में रुचि होनी चाहिए और लड़का है तो उसे पढ़ाई पूरी करके कमाने पर ध्यान लगाना है । ये कैसी अजीब उबाऊ धारणा है । सोचते हुए ऊब से भरी गहरी जम्हाई ली मैंने । मन में ऊभ चूभ सी होने लगी । चाय ख़त्म हुई तो याद आया कि बच्चों ने कहा था मम्मा हर जगह की तस्वीर जरूर लेना और हमें भेजती रहना तो कुछ तस्वीरें भी लीं मैंने वहां, घर पर फोन किया, बच्चों से बात की । वे खुश थे तो मेरा मन भी हल्का हुआ ।
यहाँ थोड़ा शेखी बघारने का मन हो रहा है मुझे कि अक्सर गर्व होता है अपनी परवरिश पर कि बचपन से ही उन्हें आत्मनिर्भर होना सिखाया है । बेटा पहली बार ताईक्वान्डो की राज्यस्तरीय प्रतियोगिता के लिए कोच के साथ लखनऊ गया तो कुल ६ साल का था और बेटी जब गयी थी तो ८ साल की । दोनों ने खुद को खुद ही संभाला और बिना कोई सामान गुम किये सकुशल वापस आये बल्कि अपना समझकर किसी का कंघा साथ ले आये थे ।
उसके बाद से तो न जाने कितनी ही बार दूसरे राज्यों में भी वे खेलने गए और अब भी जाते रहते हैं । उनके लिए मेरे टूर अब सामान्य बात हैं, हाँ अगर घर में हूँ तो थोड़ी-थोड़ी देर में मम्मा उन्हें दिखती रहनी चाहिए । खैर, एक माँ की उसके बच्चों के बारे में बातें तो कभी न ख़त्म होने वाली गाथा है तो ये फिर कभी । वहां से चली बस फिर २ बजे देहरादून पहुँच कर ही रुकी ।
देहरादून में बस जहाँ रुकी थोड़ी अजीब सी जगह लगी मुझे, ऐसी जैसे किसी कॉलोनी के बीच खाली प्लाट हो उसी में बस को ले जाकर खड़ा कर दिया हो । बस वाले से पूछा तो बोला ये बसें तो यहीं रुकती हैं । वहां सारी सवारियां उतरीं तो मैं भी अपने सामान के साथ बाहर आई । धूप थी लेकिन हवा में काफी ठण्ड थी ।
खैर एक यात्रा तो सकुशल पूरी हुई कि देहरादून पहुँच गयी ।
भारती पाठक
हमेशा की तरह सटीक वर्णन। I like the way you explain everything.
जवाब देंहटाएंThnx
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