सोमवार, 31 मई 2021

बर्फ का शिखर केदारकंठा

               

                         



 चौथी किश्त                           


         सुबह ७:३० पर हमें सांकरी के लिए निकलना था । रास्ता लम्बा था करीब ८-९ घंटे का, तो पिट्ठू बैग ऊपर ही रखा रास्ते में काम आने वाली छोटी-मोटी जरूरत की चीजों के साथ और बाकी सामान सूटकेस में जमा दिया था । बस सात बजे ही आ गयी तो सोनाली ने कहा कि चलकर पहले आगे की सीट ले लेते हैं वरना पीछे सीट मिलेगी और रास्ते में दिक्कत होगी । मुझे भी सही लगा तो अपने छोटे बैग हमने आगे की सीटों पर रख दिए तब नाश्ता करने गए । 

       नाश्ते में ब्रेड बटर, जैम ब्रेड, दलिया और उबले अण्डों के साथ चाय थी । सोनाली ने कहा कि अगर आपको नहीं खाना तो अंडे मुझे दे देना लेकिन ले जरूर लेना । मुझे हंसी आ गयी उसका अण्डों के लिए उतावलापन देखकर और ये भी समझ आया कि ये काम मुझे पूरे ट्रैक में करना है । मैंने अंडे उसे दिए और सिर्फ चाय पी क्योंकि आगे सफ़र में मैं उल्टी जैसी समस्या से बचना चाहती थी । मैंने उसे भी कहा कि ज्यादा कुछ न खाए लेकिन उसका कहना था कि उसे खासा अनुभव ऐसी यात्राओं का और उसे कोई दिक्कत नहीं होती । रास्ते में लंच के लिए पुलाव मिला जिसे सबने टिफ़िन में रखा तो मैंने भी थोड़ा रख लिया । गर्म पानी की बोतल भरी और बाकी सामान सहित बस तक आ गए । 

       सांकरी तक की यात्रा के लिए ७०० रुपये जमा करने थे जो उन्हीं सरदार जी के पास जमा किया । उनका चेहरा अब भी वैसा ही भावशून्य था लेकिन जब हमें पता चला कि इनकी सेवा हमारे साथ यहीं तक थी तो हमारे चेहरे जरूर चमक उठे । बेवजह उदास चेहरे मुझे डिप्रेस करने लगते हैं । और तो और मेरा खुद पर आत्मविश्वास ही डगमगाने लगता है कि क्या मुझमें ये भी क्षमता नहीं कि किसी के चेहरे पर मुस्कराहट ला सकूँ । फिर सोचती हूँ चल छोड़ यार, क्या पता वो व्यक्ति किसी परेशानी में हो और हमें न बता सकता हो । कंधे उचका कर आगे बस की ओर बढ़ती हूँ । सब धीरे-धीरे कर के सामान सहित बाहर निकल रहे हैं और मैं आँखों ही आँखों में उनके सामानों से अपने सामान की तुलना कर रही हूँ । खुश हूँ कि उनकी अपेक्षा मेरा समान फिर भी हल्का है । 

       बस में हमने पहले से ही अपनी पसंद की सीट पर छोटे बैग रख दिए थे तो जगह फिक्स थी । बस ड्राइवर और उसका सहयोगी सबके बड़े बैग, पीछे बस की डिग्गी में बड़े ही करीने से लगा रहे थे । जब अपना बैग सुरक्षित स्थान पर देख लिया मैंने तो बस के भीतर जाकर अपनी सीट पर जम गई । अपनी पसंद की एक किताब निकाली और उसी में सिर घुसा लिया । सोनाली बाहर अन्य लोगों से परिचय करने के अपने पसंदीदा काम में लग गई । ठीक साढ़े सात बस चल पड़ी । सफ़र कैसा और कोई भी हो चलते हुए सब जयकारा लगाना नहीं भूलते । मैं भी मन ही मन दोहराती हूँ “माधौ सकल काम साधौ” और सारी चिंताएं उस ऊपर वाले के हाथ सौंप कर निश्चिन्त हो जाती हूँ । अब मेरी चिंता ख़तम । 

       बस ड्राइवर बहुत अनुभवी हैं उन्होंने तमाम ट्रैक खुद भी किया है और न जाने कितने सालों से हम जैसे ट्रैकर्स को अपनी-अपनी मंजिलों तक पहुँचाया है तो ये भी हमारे लिए एक निश्चिन्तता की बात थी । सबके कहने पर उन्होंने बस में संगीत भी लगा दिया । मैं पढ़ते हुए बीच-बीच में अगल-बगल देख लेती हूँ । सब अपने-अपने जोड़ों में व्यस्त हैं । (जोड़े से मतलब स्त्री पुरुष नहीं ) बस अभी-अभी बालिग़ हुए चारों लड़कों का समूह कुछ बेचैन है । उन्हें वो संगीत पसंद नही आ रहा है और वे उसे बदलना चाहते हैं लेकिन ड्राइवर साहब उन्हें अपने केबिन में आने नहीं दे रहे तो वे गाना बंद करने को बोलते हैं । नहीं मानने पर शोर मचाते हैं  ड्राइवर भी जिद्दी है वॉल्यूम बढ़ा कर केबिन लॉक कर लेते हैं । 

       मुझे लगता है पहाड़ ही नहीं मैदानों में भी यात्रा के दौरान संगीत की व्यवस्था का जरूर उद्देश्य होता है जो निश्चित रूप से सिर्फ मनोरंजन तो नहीं होता । दिमाग को सक्रिय रखने में संगीत की महती भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता है । मज़े की बात ये कि संगीत सुलाने में भी प्रयोग होता है और जगाने में भी । अपने देश के शास्त्रीय संगीत में रागों की संकल्पना भी कितनी अद्भुत है । राग यमन जहाँ रात्रि विश्राम के लिए गाया जाता है वहीं राग भैरवी सुबह गाया जाने वाला राग । अब इसका मतलब ये बिल्कुल नहीं कि पाश्चात्य धुनों पर आधारित गीत संगीत बुरे हैं । वास्तव में सुरों के आरोहण और अवतरण के नियमों से ही संगीत की रचना होती है तो थोड़ा बहुत बदलाव होने पर भी संगीत, संगीत ही रहता है । आप भी सोच रहे होंगे कि यात्रा के बीच में मैं शास्त्रीय संगीत की चर्चा कहाँ से ले आयी और कहाँ की बात कहाँ लेकर चली गयी ।

         तो हुआ ये कि वो लड़के मन मसोसकर बैठ तो गये लेकिन उनके मन की भड़ास अस्फुट गालियों के रूप में बाहर आने लगी और जैसा कि भारत में सर्वविदित है गालियों के लिए महिलायें और बहनें ही सर्वथा सरलता से प्रयुक्त होती रही हैं तो यहाँ भी उनका ही आह्वान हो रहा था । हालाँकि आवाज धीमी थी या शायद हमारे होने की वजह से उन्होंने आवाज धीमी कर ली थी लेकिन काफी देर तक ड्राइवर का मजाक उड़ाते रहे, और भद्दे मजाक कर हंसते रहे । इन सबसे बाखबर या बेखबर ड्राइवर अपनी पूरी रौ में बस चलाता रहा । 

       मसूरी पीछे छूटता जा रहा था और हम उत्तरकाशी जिले में प्रवेश कर चुके थे । ऊँचे पहाड़ों और गहरी खाइयों की सुन्दरता पर जी का मिचलाना हावी हो रहा था । उससे बचने को मैंने किताब किनारे रख दी । एक घूँट पानी पिया और आँखे बंद कर लीं । धीरे-धीरे झपकी आने लगी । अचानक सोनाली ने मुझे जोर से झकझोर कर जगाया । खिड़की खोलने का इशारा करते हुये उसने अपने मुंह को हाथों से भींच रखा था । अचानक नींद खुलने से हड़बड़ाते हुए जैसे ही मैंने खिड़की खोली उसने खिड़की से सिर निकालकर सारा खाया पिया उलट दिया ।

मैं भौंचक्की सी अभी कुछ समझने का प्रयास कर ही रही थी तभी पीछे की सीट से किसी ने पानी की बोतल बढ़ायी । सोनाली ने हाथ मुंह साफ़ किया और अब खिड़की की ओर बैठने की इच्छा व्यक्त की । मन ही मन तो सोचा मैंने कि कह दूँ “सुबह कहा था मत खाओ ज्यादा । खुद पर बड़ा विश्वास था कि उल्टी नहीं होगी’ लेकिन चुप रही.....।  

       सीट पर भी कुछ छींटें पड़ गयी थी तो किसी ने उसे साफ़ करने को अख़बार का टुकड़ा बढ़ाया । तब मुझे एहसास हुआ कि हम एक समूह में हैं जहाँ आपस में बात होना जरूरी नहीं लेकिन सब में समूह में होने और एक-दूसरे की मदद का भाव है । मैं सरक कर किनारे की तरफ आ गयी और सोनाली ने खिड़की थोड़ी सी खोलकर उस पर अपना सिर टिका दिया । मैंने भी फिर से आँखे बंद कीं, अपना सिर उसी के कंधे पर टिका लिया और सोनाली जैसी स्थिति से बचने को फिर सोने की कोशिश करने लगी ।

       १० बजे बस उत्तरकाशी के ही किसी चौराहे पर रुकी जहाँ आधे घंटे का ब्रेक लिया   गया । खिली धूप में थोड़ी देर को हाथ पैर सीधे किये सबने । वहीँ एक ढाबेनुमा होटल में कुछ लोग नाश्ता करने लगे । मुझे वाशरूम जाने की जरूरत महसूस हो रही थी ।

ढाबे वाले से पूछा कि वाशरूम किधर है ? 

उसने सर ना में हिलाया और बोला – “हमारे यहाँ नहीं है ।”

      लो ये क्या बात हुयी ? वाशरूम तो आजकल छोटे से छोटे ढाबेवाले भी बनाकर रखते है क्योंकि चाय नाश्ते के अलावा इस नैसर्गिक आवश्यकता के चलते भी कस्टमर आते हैं । सोनाली किसी से बातें करने में व्यस्त थी तो सोचा थोड़ा आगे चलकर देखती हूँ शायद एकांत सी कोई जगह ही मिल जाए । सफ़र में ये एक बड़ा मुद्दा होता है । खुशकिस्मती से थोड़ा ही आगे जाने पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा ‘सुलभ शौचालय’ दिख गया । जान में जान आयी । बाथरूम बेहद साफ़ सुथरा था तो धन्यवाद देना बनता था उसके संचालक को और इसमें मैंने देर नहीं की । 

         बातों-बातों में ये जानकारी मिली कि सांकरी में कोई एटीएम जैसी सुविधा नहीं मिलेगी । वैसे तो मैं ज्यादा कैश ही लेकर आना चाह रही थी लेकिन पतिदेव का कहना था जब कार्ड से पेमेंट की सुविधा तो क्या जरूरत ज्यादा कैश लेकर चलने की, सो पैसे वापस रख दिए । वैसे भी आने-जाने की टिकट पहले से बुक थी । खाने-वाने का इंतजाम भी खुद को नहीं देखना था और बाकी एटीएम था ही तो निश्चिन्त थी । कुल तीन हजार रुपये पर्स में थे बाकी कुछ छुट्टे जिसमें से ७०० पहले ही किराए के लिए दे चुकी थी । बस वापसी का किराया देना था, फिर भी सामने एटीएम दिखा तो सोचा कुछ पैसे निकाल लूँ क्या पता कुछ खरीदने की ही इच्छा हो जाए या कोई जरूरत ही पड़ जाए । कई लोगों ने पैसे निकाले वहां तो जब तक मेरी बारी आई पैसे ख़त्म थे ।

      सोनाली ने भी पैसे निकाले थे और कहा जरूरत हो तो मुझसे ले लीजियेगा । मुझे भी ये आईडिया ठीक लगा कि अगर जरूरत पड़ी उससे लेकर उसे देहरादून पहुंचकर एटीएम से निकाल कर दे दूंगी, सोचते हुए ढाबे से एक कप चाय लेकर मैं बस में ही बैठकर पीने लगी । सोनाली चाय कम पीती थी तो मुझे अक्सर अकेले ही पीना पड़ रहा था । 

       एक-एककर सब बस में आ रहे हैं । एक-दूसरे को देखकर मुस्कुरा रहे हैं अपरिचय की सीमाएं टूट रही हैं यानि परिचय की शुरुआत हो गयी है । अपने राज्य या शहर के समूह से सब धीरे धीरे मुक्त हो रहे हैं । ये मुक्त होना ही वास्तव में असल यात्रा की शुरुआत है जब हम अपने आसपास बुने सुरक्षा और सुविधा के घेरे से निकलकर एक अनजानी दुनिया में सहजता से प्रवेश करने लगते हैं ।

     

       भारती पाठक

शनिवार, 29 मई 2021

बर्फ का शिखर केदारकंठा यात्रा भाग 3


 कोरोना काल में स्वप्नलोक की सैर

                         



         पहले भी कई बार मसूरी जाना हुआ है लेकिन तब परिवार के साथ थी तो बस कोई कार बुक करके चले जाते थे हम लेकिन इस बार अकेले के लिए कार बुक करना खर्चीला लगा मुझे तो सोचा बस से चलती हूँ । ड्राइवर से पूछा कि मसूरी के लिए बस कहाँ मिलेगी तो बोला ५०० मीटर पर ही बस अड्डा है वहां चली जाइए लेकिन इस समय बस मिलना मुश्किल है । सोच में पड़ गयी कि क्या करूँ ? किससे पूछूं, तभी अपने हॉस्टल टाइम की फ्रेंड दीपा का ख़याल आया जो देहरादून में ही रहती थी । उसे फोन मिलाया कि मसूरी के लिए बस मिलेगी या नहीं और मिलेगी तो कहाँ से ।

        अब आप ये सोच रहे होंगे कि साधन तो बहुत हैं मसूरी जाने के । कोई भी कार रिज़र्व कर लो और चले जाओ लेकिन एक ट्रैकर और सामान्य पर्यटक में ये भी अंतर कि ट्रैकर कम से कम पैसे में अपनी मंजिल तय करता है तो मुझपर फिलहाल ट्रैकर होने का नशा चढ़ा था और उसी तरह जाना था या कम से कम जाने का प्रयास तो करना ही था । आखिरी आप्शन तो कार का था ही । दीपा से बात हुई तो बोली तुम जहाँ हो वहां की लोकेशन भेजो मेरा भाई भी अपनी स्कूटी से मसूरी जा रहा तुम्हे भी लेता जायेगा । बस ये वादा करो कि वापसी में मिलकर ही जाओगी । ये तो यूँ हुआ मानो सोने पर सुहागा यानि फ्री की लिफ्ट ।

        लेकिन स्कूटी से मसूरी ? मुझे भी एक बारगी लगा कैसे ? फिर एडवेंचर का कीड़ा दिमाग में कुलबुलाया तो मन को मनाया । लोकेशन भेजा तो उसका भाई थोड़ी ही देर में मेरे सामने था । उसने मेरा ट्राली बैग आगे पैरों के पास रखा और मुझे पीछे आराम से बैठने को कहा और चल पड़ी मैं इस अचानक तय की सवारी के साथ अपने पहले पड़ाव की ओर । दीपा और मेरा साथ करीब साल भर का था जब हॉस्टल में हम थे । हालांकि वो दूसरे कमरे में रहती थी और उसकी रूममेट दूसरी लड़की थी लेकिन हम दोनों स्पोर्ट्स से जुड़े थे तो दोस्ती गहरी हो गयी थी । 

        हम रास्ते में कई जगह रुकते हुए गए क्योंकि इस तरह चढ़ाई पर स्कूटी के पीछे बैठना निश्चित रूप से आरामदायक नहीं था । एक वजह और थी कि मेरा छोटा पिट्ठू बैग भी कंधे पर था जो दिक्कत कर रहा था । दूरी कुल ३५-३६ किलोमीटर की थी जो हम मैदान में रहने वालों के लिहाज से खास नहीं थी लेकिन चढ़ाई पर ये बहुत होती है । ये तो अच्छा हुआ कि मुझे जहाँ पहुँचना था वो जगह मसूरी से ७ किलोमीटर पहले ही एकदम सड़क से लगी हुई थी । जान में जान आई जब करीब घंटे भर में हम यूथ हास्टल के सामने खड़े थे । भाई (मेरे नहीं दीपा के ) को थैंक्स बोल कर विदा किया और सामान लेकर थोड़ी देर बाहर ही खड़े होकर मौसम का जायजा लेते हुए पीठ सीधी की । सारे रास्ते पीछे की तरफ झुके-झुके हालत ख़राब हो गयी थी । हालांकि उल्टी या चक्कर जैसी कोई समस्या जरा भी महसूस नहीं हुई ।  

       सड़क से लगा हुआ मसूरी यूथ हॉस्टल मुख्य शहर से एकदम अलग-थलग सा है । आसपास कोई आबादी नही थी इक्का-दुक्का छोटी दुकानों को छोड़कर, वो भी कुछ दूर चलने पर । मुख्य द्वार के बाद बायीं तरफ लोहे की रेलिंग बनी थी जिसके नीचे गहरी खाई । रेलिंग के पास ही कुछ मेरी ही तरह के ट्रैकर ठंडी हवा के मज़े ले रहे थे । मोबाइल में तापमान देखा तो माइनस १ डिग्री था । ठीक सामने कांच का दरवाजा जिससे आर पार दिख रहा था कि अन्दर क्या है । दरवाजा खुला ही था जहाँ लगे सोफे पर एक सरदार जी तमाम कागज पत्रों के साथ उलझे थे । उम्र कोई ३५-३६ की रही होगी, सुगठित शरीर और साफ़ रंग जो पहली ही नज़र में किसी को भी प्रभावित कर दे । मैंने अपना सामान किनारे रखा और उन्ही से मुस्कुराकर पूछा- “केदारकंठा ट्रैक की रिपोर्टिंग यही करनी है ?” 

      “जी ! अपना एडमिट कार्ड और मेडिकल दीजिये और ये फॉर्म भर दीजिये ।” एक खोखली सी आवाज सुनाई दी । 

        बोलते हुए उनका चेहरा इतना सपाट और भावशून्य लगा कि जैसे हिमालय से सीधा पधारे कोई महात्मा जो मोक्ष को प्राप्त कर चुके हों । न मुस्कराहट, न गुस्सा, घनघोर प्रोफेशनल की तरह सीधी सपाट अभिव्यक्ति । मन थोड़ा बुझ सा गया कि क्या इनके साथ हमें ८ दिन बिताने हैं ? हे भगवान् ! मन ही मन सोचा मैंने कि अच्छा हुआ कुछ खास प्रभावित नहीं हुई थी, फिर बेफिक्री से कंधे उचकाये कि मुझे क्या, और जरूरी कागज़ जिस भाव से उनकी ओर बढ़ाये उसी भाव से उन्होंने उसे देखा और एक फॉर्म भरने के लिए दिया । फॉर्म भर कर उन्हें दिया तो उसे रखकर बाकी कागज मुझे वापस देते हुए बोले कि इसे सांकरी में रजिस्ट्रेशन के समय जमा कीजिये । पास ही रखे रजिस्टर की ओर इशारा कर बोले – इसमें अपनी एंट्री कर दीजिये । कथा का ये अध्याय वहीँ ख़त्म । 

        वहां एंट्री के बाद दाहिनी ओर बने रिसेप्शन काउंटर पर भी एंट्री की जहाँ खड़े कर्मचारी के मुस्कराहट भरे स्वागत से मन को थोड़ी राहत मिली । 

“आप कहाँ से आयी हैं ?” उसने मुस्कुराकर पूछा । 

“अयोध्या से ।” मैंने भी हंसकर जवाब दिया ।

“अरे वाह ! रामजी की नगरी से ।” वह चहकते हुए बोला । धन्य हो राम जी और धन्य आपकी अयोध्या जो कहीं भी जाने पर नाम लेते ही हमें विशेष महसूस करा देते हैं । मन ही मन बुदबुदाई ।

         राम मंदिर का हाल चाल पूछते हुए उसने मुझे कमरा नंबर बताया और रास्ता दिखाते हुए थोड़ी देर में चाय के लिए डाइनिंग हाल में आने को बोला । सच कहूँ मुझे तो मुस्कराहट से बड़ा और कोई परिचय लगता ही नहीं । मन में कैसी भी तल्खी हो तुरंत घुल जाती है । चाय का तो नाम सुनकर वैसे भी राहत मिल  गयी ।

        रिसेप्शन से नीचे कुछ सीढ़ियाँ उतर कर बाएँ तरफ का आखिरी कमरा था जिसमें उस रात रुकना था और अपने दूसरे साथियों से मुलाक़ात होनी थी । कमरा खासा बड़ा किसी डॉरमेटरी जैसा था जिसमें करीब दस बेड लगे थे । किनारे सामान रखने के लिए आलमारियाँ बनी थी । सामान तीन बिस्तरों पर रखा था लेकिन खिड़की से लगे बेड पर एक ही लड़की बैठी फोन पर किसी से बात कर रही थी । उसी के बगलवाले बेड पर मैंने अपना सामान रखा । मुस्कराहट भरे अभिवादन और नामों का आदान प्रदान हुआ । 

        इस तरह सोनाली से मेरी पहली मुलाक़ात हुई । सोनाली उड़ीसा से थी लेकिन नौकरी गुजरात में और शादी गुजराती से हुई थी तो फिलहाल गुजरात में सेटेल्ड थी सो वहीँ से आई थी । उड़ीसा उसकी जन्मभूमि थी तो उसे वहीँ का होना कहलाना ही पसंद था और गुजरातियों का अत्यधिक वाणिज्यिक स्वभाव नापसंद । उसे साहसिक यात्रायें करना पसंद था और वो काफी सालों से ट्रैकिंग कर रही थी तो उसे काफी अनुभव भी था । ये बात उसका पिट्ठू बैग देखने से ही पता चल रही था जो छोटा सा था । उसके पति से उसकी मुलाक़ात भी किसी ट्रेकिंग के दौरान ही हुई थी फिर दोस्ती, प्यार और काफी साल तक दोनों के परिवारों को मनाने की जद्दोजहद के बाद अंतत शादी । 

        शादी को दो साल हुए थे लेकिन पारंपरिक शादीशुदा औरतों जैसे कोई लक्षण न शरीर पर थे न उसके मन पर । सोनाली को मेरी फिटनेस ने प्रभावित किया जबकि वो खुद भी फिट थी और मुझे उसके व्यवहार ने । वो बरसों से इस तरह की यात्राएँ करती आ रही थी और प्रभावित होने की बात थी कि शादी के बाद भी उसके पति का कहना था कि साथ में ट्रैकिंग के अलावा भी दोनों को एक-एक सोलो ट्रैक जरूर करनी है । अच्छा लगा मुझे उससे मिलकर ।

        साधारणतः कोई स्वयं पहल न करे तो मुझे किसी से घुलने मिलने में समय लगता है । मुझे खुद का साथ ही ज्यादा पसंद है । किसी से बिना उसके स्वयं बताये कुरेद-कुरेद कर जानकारी लेना और मतलब रखना सख्त नापसंद मुझे, इसके अलावा मेरा स्वभाव थोड़ा शक्की होने के साथ–साथ झेंपू भी है कि किसी से मिलने पर उसका चेहरा और मन पढ़ने की कोशिश और अनुमान लगाने में ही सारा समय बीत जाता है । सोनाली की पहल से ये तो पक्का था कि हमारी दोस्ती होनी है और हो भी गयी । अनजान जगह पर ऐसे किसी साथी का मिलना कितना सुकून भरा हो सकता है मैं महसूस कर रही थी । 

        सफ़र की थकान उतारने को मैं नहाना चाहती थी तो सोनाली से बाथरूम के बारे में पूछा । बाथरूम बिलकुल हमारे कमरे के बगल में ही था । सोनाली ने खुद जाकर गीजर ऑन कर दिया और बोली – “गर्म पानी से नहाइए यहाँ ठण्ड ज्यादा है ।” सच कहूँ तो उसका मेरी परवाह करना अच्छा लगा मुझे । जब तक पानी गर्म हुआ हमने ढेरों बातें की । कुछ अपने शौक और घुमक्कड़ी को लेकर तो कुछ घर परिवार की, कुछ नौकरी की बाध्यताओं की भी जिसके चलते घुमक्कड़ी में अनचाही बाधा आती है । बातों में कितना ही समय बीत गया तो याद आया कि पानी कब का गरम हो चुका होगा । मैं नहाने चली गयी और सोनाली फ़ोन में व्यस्त हो गयी ।

        नहाकर बाथरूम से निकली ही थी कि रसोइया आ गया चाय के लिए बुलाने । मन में आया – अरे वाह ‘नेकी और पूछ पूछ’ शायद इसे ही कहते होंगे । सुबह ८ बजे चाय पी थी उसके बाद से मौका ही नहीं मिला था कहीं रूककर कुछ खाने-पीने का । जल्दी से कपड़े बदले और हम दोनों ही डाइनिंग हाल में सबसे पहले पहुंचे लेकिन दोनों ही चाय पीने को साथ में गिलास ले ही नहीं गए थे तो रसोई में जाकर गिलास माँगा और चाय लेकर अपनी कुर्सियों पर जम गए । डाइनिंग हाल इतना बड़ा था कि ४०-५० लोग एक साथ बैठकर खाना नाश्ता कर सकें । थोड़ी देर में बाकी सब भी आ गए । अधिकतर लोग ४-५ के समूहों में आये थे । सबसे कम उम्र के लड़कों का एक ग्रुप था जो बस बालिग़ हुए ही थे और सबसे ज्यादा उम्र के दो व्यक्ति करीब ५२-५५ साल के । उन्होंने अपने-अपने समूह में बैठ कर ही चाय पी और आपस में बातें करते रहे । सोनाली बेचैन थी ये जानने को कि हमारे ग्रुप में कौन-कौन है लेकिन उन सबके अपने आप में मगन होने से वो थोड़ी बुझ सी गयी । 

        “लगता है इनमे से अधिकतर पहली बार ट्रैकिंग वाले हैं तभी एकदूसरे से बात भी नहीं कर रहे, न परिचय करने की कोशिश ही ।” वह मेरे कान के पास आकर फुसफुसाई ।

      “अरे यार ! अभी तो आये हैं सब, थके होंगे धीरे धीरे साथ रहने से परिचय हो ही जायेगा ।” कहते हुए मैं मन ही मन खुश हो रही थी कि अच्छा ही है कोई ज्यादा बात न करे । 

        उसने बताया कि पहले के ट्रैक्स में ऐसा होता आया है कि एक छोटी सी मीटिंग होती है जब सभी सदस्यों का एक दूसरे से परिचय कराया जाता है । उसे लगा कि शायद अभी न होकर रात के खाने पर सबसे परिचय कराया जाय ।

 चाय का गिलास धो कर हमने रसोई में लौटा दिया और आगे गिलास मांगने की समस्या से बचने को हम दोनों बाजार की ओर निकले कि कोई स्टील का मग खरीद लें । करीब एक किलोमीटर चलने के बाद भी छिटपुट चीजों जैसे चिप्स, कुरकुरे, चाय आदि के अलावा कोई और दुकान नहीं दिखी । पता चला ये मसूरी का बाहरी इलाका है और बाज़ार यहाँ से काफी दूर है । ऐसे अवसरों पर अपने मैदानी शहर बड़े काम के लगते हैं जहाँ ऑटो या रिक्शा की सुविधा होती है कि पलभर में जाकर सामान ले आते । यहाँ तो ऐसी कोई सुविधा नहीं दिख रही थी । चूँकि शाम हो चली थी और थकान भी थी तो हमने आगे सांकरी पहुंचकर गिलास खरीदने का इरादा किया और हॉस्टल वापस लौट आये । 

        कमरे में पहुंचे तो जिनके सामान बिस्तर पर रखे थे वो दोनों लड़कियाँ भी आ चुकी थीं । आपस में परिचय का आदान-प्रदान हुआ । पहली थी अश्वी जो अपने मंगेतर के साथ आयी थी । स्वाभाविक था उसे और किसी के साथ की जरूरत बिलकुल नहीं थी । वो और उसका मंगेतर एक ही फ़र्म में काम करते थे तो हमने कयास लगाया कि लव मैरेज का मामला होगा जबकि उसका कहना था कि शादी घर वालों की मर्जी से तय हुई है । दूसरी थी सलोनी जो अपने दोस्तों के साथ आयी थी । 

        हालांकि सलोनी ने बताया कि गुजरात में लड़कियों को इस तरह लड़कों के साथ माता-पिता कहीं बाहर जल्दी नहीं भेजते लेकिन उसकी इच्छा के आगे उसके मम्मी पापा मान गए थे । देखने में खूबसूरत सलोनी उतनी ही नाजुक मिजाज लेकिन कुछ रिज़र्व सी लगी । ठण्ड जरूर थी लेकिन जिस तरह उसने खुद को ऊपर से नीचे तक जैकेट और जुराबों से ढँक रखा था मुझे तो उसे देख कर गर्मी लग रही थी । हाँ दोनों में, नहीं बल्कि तीनों में एक बात कॉमन थी कि वे गुजरात से आयी थीं तो बीच-बीच में गुजराती में भी बातें करती थीं जिन्हें समझना बहुत मुश्किल नहीं था ।

        कुछ देर अपने काम-काज और घर-परिवार की बातें करके सब अपने-अपने कामों में लग गए । ये तो तय हो गया था कि इस ग्रुप में हम चार ही लड़कियाँ हैं और साथ भी लगभग तय ही था । मैं सोनाली के साथ और सलोनी अश्वी के साथ । रात के खाने के समय भी परिचय जैसी कोई बात नहीं हुई बस इतना कहा गया कि सबको सुबह ७ बजे नाश्ता करके और लंच लेकर बाहर मिलना है । 

        रात थके होने से अच्छी नींद आई । हालांकि सर्दी बहुत थी और हमने दो-दो रजाइयां ओढ़ी थीं । सुबह ५ बजे ही आँख खुल गयी । सुबह की पहली चाय नहाकर पी । सामान खुला पड़ा था तो समेटने बैठी । एक बात मुझे आजतक समझ नहीं आयी कि कहीं यात्रा पर जाने के लिए जब हम पैकिंग करते हैं तब तो सामान सूटकेस में अच्छे से समा जाता है और थोड़ी जगह भी बच जाती है । एक बार उसे खोलकर सामान निकालने पर दोबारा ठीक से बंद क्यों नहीं होता या सामान बढ़ कैसे जाता है । कई बार सामान को निकाला-रखा तब जाकर चेन बंद हुई ।


        भारती पाठक

शुक्रवार, 28 मई 2021

बर्फ के शिखर केदारकंठा की यात्रा 2




       जिस दिन निकलना था ठण्ड अपने चरम पर थी । निश्चित जगह पर खड़े होकर बस का इंतज़ार करते घंटे हो गए । बस का कहीं अता-पता नहीं था । बस आपरेटर को कॉल किया तो उसने ड्राइवर का नंबर दिया । ड्राइवर से बड़ी मुश्किल से बात हो पाई तो पता चला कि बस बस्ती जिले में खराब हो गयी है और बन रही सो आने में अभी एक डेढ़ घंटे लगेंगे । एक तो ठण्ड और बर्फीली हवा, दूसरे कहीं बैठने की जगह भी नहीं तो खीझ लग रही थी लेकिन क्या करती वापस घर जाने का भी साधन नहीं था कि लौट जाती क्योंकि जो पहुँचाने आया उसे भी घर भेज चुकी थी । इतनी ठण्ड में उसे दुबारा बुलाने की इच्छा नही हुई ।

       इस तरह की बसों के रुकने का स्थान शहर के बाहरी हिस्से में बाईपास शुरू होते ही होता है । मेरी ही तरह और भी कई लोग अपनी-अपनी बसों के इंतज़ार में खड़े थे । कुछ सड़क पर बने डिवाइडर पर ही जगह बनाकर बैठ गए थे । इधर उधर देख ही रही थी तभी पास ही एक चाय के ठेले वाले ने अपनी इकलौती टूटी कुर्सी मेरी ओर खिसकाते हुए कहा कि “बैठ  जाइए ।” वह अपनी दुकान लगभग बढ़ा चुका था और अब दिनभर की बिक्री के बाद जमा हुए खाली गिलास और दोने वगैरह जलाने जा रहा था । काफी देर से खड़ी-खड़ी थक गयी थी तो कुर्सी पर बैठकर गहरी सांस ली मैंने ।

       कभी-कभी भारत वर्ष में जन्म लेने पर इतराने का मन होता है जहाँ कलियुग में भी इतनी सहृदयता बची है कि लोग अपना आराम छोड़कर दूसरे के बारे में सोचते हैं । कुर्सी टूटी जरूर थी लेकिन उसके चारो पैर सुरक्षित थे और बैठने की जगह भी ठीक थी बस पीछे का हिस्सा जहाँ पीठ टिकाते हैं वही टूटा था । खैर शहर के बाहर, सड़क किनारे बैठने का ठिकाना मिला ये ही क्या कम था । 

       गिलास और दोने का कूड़ा जलते ही कई लोग सिमटकर वहीँ आ   गए । हालांकि उसमें धुआं अधिक आग कम थी लेकिन लोगों ने उसे घेर रखा था । मुझे बैठे- बैठे बीरबल की खिचड़ी वाली कहानी याद आ गयी जिसमें वो बूढ़ा व्यक्ति दूर गाँव में जलती टिमटिमाती लौ को देखते, उसी के सहारे रात भर ठन्डे पानी में खड़ा रहा । मैं उस धुएं वाली आग से दूर थी लेकिन आग को देखने से भी जैसे गर्मी मिल रही थी या सर्दी से ध्यान हट गया था ।

       पास ही एक २३-२४ साल की लड़की भी सामान सहित खड़ी थी । एक बार इच्छा हुई उससे पूछूं कि उसे कहाँ जाना है ? क्या पता उसी बस में जा रही हो तो साथ हो  जाएगा । लेकिन उसके चेहरे पर पसरी अजनबीयत को देखकर ये विचार त्याग दिया । अच्छा हुआ कि थर्मस में चाय ले आई थी तो गिलास में चाय निकाली और सुड़कने लगी ।  

        दो घंटे कड़कती ठण्ड में हाई वे के किनारे इंतज़ार के बाद अंततः बस आ ही गयी । मोटे जैकेट में भी हवा सुई सी चुभ रही थी । बस आते ही अपनी सीट ली । सीट के नीचे खाली जगह में सूटकेस रखा और खाने पीने के सामान तथा छोटी-मोटी जरूरत की चीजों वाला पिट्ठू बैग सीट पर ही रख लिया । सीट स्लीपर थी और खासी लम्बी चौड़ी तथा आरामदायक । भीतर जाकर मैंने केबिन अन्दर से बंद किया, तकिये पर सर रखा और आँखें मूंदकर गहरी सांस ली । बस के वातानुकूलित माहौल और बाहर की ठण्ड के बीच धीरे धीरे शरीर को अनुकूल  होने दिया और मन को भी जो पिछले दो महीने से, जाने और न जा पाने की कशमकश में शारीरिक, मानसिक तैयारियों से जूझता रहा था । क्या सचमुच इतना आसान था, बस निकल पड़ना अपने मनोमय संसार में यूँ ही विचरने को । 

        काम से घर आकर थोड़ी देर बाद अगर पुरुष ये कहते हैं कि थोड़ी देर को बाहर जा रहा घूमने तो कितनी सामान्य सी बात लगती है और जब एक औरत यही बात कहे तो कितनी विचित्र । उसके सामने दुनिया भर के सवालों की फेहरिस्त कि क्या जरूरत बाहर जाने की ?, क्या लाना है बता दो मैं लेता आऊंगा, ये औरतों के घर से बिना काम बाहर जाने का समय थोड़ी है, शाम को चौराहों पर वैसे भी लफंगे खड़े रहते । अब उनसे कौन पूछे कि जब बाहर सब लफंगे तो आप भला उनकी संख्या में इजाफा करने क्यों जा रहे हैं ? लेकिन वो बड़े बुजुर्ग कहते हैं न कि समझदार औरतें गृह-कलह टालती है भले खुद मानसिक त्रास से गुजरना पड़े । 

       यहाँ इस बात की चर्चा करने की मंशा कौन सही या कौन गलत का आकलन करना नहीं बल्कि उन महिलाओं में अपने अस्तित्व के प्रति, अपने स्वाभिमान के प्रति और अपनी इच्छाओं को सम्मान देने का भाव जगाने का प्रयास भर है जिन्हें औरत होने से शिकायत होती है । खैर फिलहाल तो अपनी यात्रा पर आती हूँ  ।

       अचानक बस झटके से रुकी तो मेरी तन्द्रा टूटी । पर्दा हटाकर देखा तो बाराबंकी टोल प्लाजा आ गया था यानि मैं लगभग एक डेढ़ घंटे में काफी पीछे हो आई थी । भूख लग रही थी तो साथ लाये टिफ़िन से थोड़ा सा कुछ खाया, पानी पीकर केबिन अन्दर से बंद कर निश्चित लेट गयी और फिर करवट बदलते-बदलते आँख लग ही गयी । लोगों के उतरने की चहल-पहल से फिर नींद टूटी तो घड़ी देखी, सुबह के पांच बजे थे और बस स्टैंड था दिल्ली । 

       दिल्ली ? दिमाग घूम गया । ये बस दिल्ली होकर जाएगी यानि कम से कम ५ घंटे अतिरिक्त । हद है यार, ये डिटेल तो देखी ही नहीं टिकट बुक करते समय । ये इस सफ़र का पहला सबक था तो आगे से टिकट बुक करते समय उसका रूट भी देखना होगा अच्छी तरह । खैर अब चारा भी क्या था सो फिर से कम्बल में सिर डाला और लेट गयी । किसी के केबिन का दरवाजा खटखटाने से जब आँख खुली तो देखा बस एक ढाबे पर रुकी थी । सुबह के ८ बजे थे और बस वहाँ ३० मिनट रुकने वाली थी । मतलब था कि जिसे फैश होना हो या चाय नाश्ता करना हो तो कर ले । 

       हाई वे के किनारे से लगा यह ढाबा तो काफी लम्बा चौड़ा था लेकिन वाशरूम बहुत गंदे । अब पता चल रहा था कि बस में कौन कौन सी सवारियां हैं । रात में तो बस अपनी सीट पर जाकर कुछ देख ही नहीं पायी थी । कुछ लोग सड़क पार कर सामने पेट्रोल पंप का वाशरूम इस्तेमाल के लिए गए । कुछ महिलायें भी जा रही थीं तो मैं भी वहीँ चली गयी । वापसी में उसी के पास वाली चाय की टपरी से चाय भी लेती हुई आई । हालांकि पहली बार एकदम अकेले इतनी लम्बी यात्रा पर थी वो भी बस से तो मन में एक धुकधुकी सी भी हो रही थी कि कहीं मेरे चढ़ने से पहले बस चल न पड़े । बाहर ही खड़े होकर चाय पीते हुए सुबह की ताज़ी हवा के साथ ही सुखद सी आज़ादी महसूस की ।

       क्या चाहिए होता है मन को ? बचपन में जल्दी बड़े होने का कितना उतावलापन   होता है । लड़कियों में मां की साड़ी पहनने, बिंदी लगाने, उन्ही की सैंडिल पहनकर चलने का और लड़कों में पिता के जूते पहनने, उनकी शेविंग किट इस्तेमाल करने, उनकी शर्ट पहनकर उनके जैसा दिखने का चाव । बड़े होने पर नौकरी पाने का । नौकरी मिली या नहीं मिली तो भी शादी, फिर बच्चे, फिर अपना मकान और उसे सजाना-संवारना फिर बैंक बैलेंस और फिर ? ये फिर ही तो हमें चैन से बैठने नहीं देता । जिस दिन इस फिर-फिर से आजादी मिल जाए वही सच्चा सुख हो शायद ।

       मुझे तो लगता है सबके साथ यही होता होगा । हमारा सामजिक ढांचा ऐसा है कि लड़कों के लिए वैसे तो कोई खास नियम नहीं, आज़ादी रहती है लेकिन फिर भी सामाजिक भागीदारी और पारिवारिक जिम्मेदारी को लेकर उनपर जो मानसिक दबाव होता है जाने क्यों मुझे उनसे सहानुभूति सी होती है । 

       वैसे भी पुरुष हो या स्त्रियां, यहाँ कंडीशनिंग वाली बात दोनों पर लागू होती है कि एक चक्र की तरह जीवन को एक निश्चित खांचे में फिट कर चलाने या विशेष समर्थ न होने पर स्वतः चलने देने का जो मन्त्र हमारे कानों में बचपन से फूंका जाता है उसका असर जाते-जाते जाता है । अधिकतर का तो मरते दम तक नहीं जाता । लड़की है तो उसे घर के काम काज सीखने में रुचि होनी चाहिए और लड़का है तो उसे पढ़ाई पूरी करके कमाने पर ध्यान लगाना है । ये कैसी अजीब उबाऊ धारणा है । सोचते हुए ऊब से भरी गहरी जम्हाई ली मैंने । मन में ऊभ चूभ सी होने लगी । चाय ख़त्म हुई तो याद आया कि बच्चों ने कहा था मम्मा हर जगह की तस्वीर जरूर लेना और हमें भेजती रहना तो कुछ तस्वीरें भी लीं मैंने वहां, घर पर फोन किया, बच्चों से बात की । वे खुश थे तो मेरा मन भी हल्का हुआ । 

       यहाँ थोड़ा शेखी बघारने का मन हो रहा है मुझे कि अक्सर गर्व होता है अपनी परवरिश पर कि बचपन से ही उन्हें आत्मनिर्भर होना सिखाया है । बेटा पहली बार ताईक्वान्डो की राज्यस्तरीय प्रतियोगिता के लिए कोच के साथ लखनऊ गया तो कुल ६ साल का था और बेटी जब गयी थी तो ८ साल की । दोनों ने खुद को खुद ही संभाला और बिना कोई सामान गुम किये सकुशल वापस आये बल्कि अपना समझकर किसी का कंघा साथ ले आये थे । 

       उसके बाद से तो न जाने कितनी ही बार दूसरे राज्यों में भी वे खेलने गए और अब भी जाते रहते हैं । उनके लिए मेरे टूर अब सामान्य बात हैं, हाँ अगर घर में हूँ तो थोड़ी-थोड़ी देर में मम्मा उन्हें दिखती रहनी चाहिए । खैर, एक माँ की उसके बच्चों के बारे में बातें तो कभी न ख़त्म होने वाली गाथा है तो ये फिर कभी । वहां से चली बस फिर २ बजे देहरादून पहुँच कर ही रुकी । 

        देहरादून में बस जहाँ रुकी थोड़ी अजीब सी जगह लगी मुझे, ऐसी जैसे किसी कॉलोनी के बीच खाली प्लाट हो उसी में बस को ले जाकर खड़ा कर दिया हो । बस वाले से पूछा तो बोला ये बसें तो यहीं रुकती हैं । वहां सारी सवारियां उतरीं तो मैं भी अपने सामान के साथ बाहर आई । धूप थी लेकिन हवा में काफी ठण्ड थी । 

       खैर एक यात्रा तो सकुशल पूरी हुई कि देहरादून पहुँच गयी ।  


        भारती पाठक

बुधवार, 26 मई 2021

सांकरी (उत्तराखंड)

  सांकरी मसूरी से करीब 200 किलोमीटर की दूरी पर करीब 300 साल पुरानी घाटी में स्थित छोटा सा किंतु बेहद खूबसूरत गांव ट्रैक प्रेमियों के लिए मानो स्वर्ग का द्वार है । कहते हैं यहाँ पर्शियन और ग्रीक सहित दुनिया भर की वंशावली है। 220 से 230 परिवारों में करीब 22 परिवार ओशो सन्यासी को मानने वाले हैं । यह टोंस नदी से लगा हुआ है । सांकरी से करीब 15 किलोमीटर आगे जखोल के पास ही टोंस नदी का उद्गम स्थल है ।




        साहसिक चढ़ाई, बर्ड वाचिंग, पहाड़ी ग्राम्य जीवन का अनुभव करना, या होम स्टे करना हो तो सांकरी सर्वोत्तम है । कुछ लोग तो इसे होम स्टे गाँव भी कहते हैं । सांकरी का मुख्य व्यवसाय सेब तथा राजमा की खेती करना है । इसके अलावा आलू, धान, गेहूं और मडुआ की उपज भी होती है लेकिन जबसे युवाओं में ट्रैकिंग का क्रेज बढ़ा है लोगों ने इसे भी व्यवसाय के रूप में अपना लिया  है । 

         पढ़ाई के साधनों का देखें तो १२ वीं तक के सरकारी स्कूल हैं यहाँ लेकिन इतनी दूर दराज की पोस्टिंग पर एक तो कोई आना नहीं चाहता दूसरे आता भी है तो जल्दी ही ट्रांसफर लेना चाहता है । पढ़ाई की इस सुविधा और असुविधा के बीच जिन घरों की आय ठीक ठाक है वे बच्चों को आगे की पढाई के लिए पुरोला, जो करीब ५७ किलोमीटर है या देहरादून, जो २३० किलोमीटर है, भेजते हैं वरना १२ वीं के बाद वे अपने पुस्तैनी काम में लग जाते हैं । 

       सांकरी को ट्रैकिंग का हब भी कहते हैं क्योंकि तमाम सारे ट्रैकिंग जैसे केदारकंठा, हर की दून, बाली पास, फुलारा रिज, रुपिन पास, रुन्स्यारा लेक, देव क्यारा बुग्याल, लेखा टॉप, विजय टॉप आदि के रूट यहीं से शुरू होते हैं । यह ट्रैक उत्तराखंड के गोविन्द वन्य जीव अभ्यारण और राष्ट्रीय उद्द्यान में स्थित है जिसके लिए वन विभाग से अनुमति लेनी पड़ती है । इसके लिए शुल्क प्रति व्यक्ति १५० रुपये है । किसी ट्रैकिंग एजेंसी के साथ जाने में ये सुविधा होती है कि ये अनुमति वगैरह की जिम्मेदारी उनकी होती है । वैसे भी बिना गाइड लिये अकेले वहां जाने की अनुमति नहीं है । गाइड वहाँ आसानी से मिल जाते है जो 1200 से 1500 सौ रुपये प्रति ट्रेक चार्ज करते हैं उसमें समान ढोने वाले पॉटर का किराया शामिल नही है । इसके साथ ही ट्रेकिंग से संबंधित सामान भी यहां किराए पर मिलते है । इस क्षेत्र की एक ख़ास बात ये है कि सर्दियों में जब पूरे उत्तराखंड का सीजन बंद होता है, सांकरी का सीजन शुरू होता है । यह गाँव सर्दियों की ट्रैकिंग के लिए विशेष रूप से जाना जाता है ।

शुक्रवार, 21 मई 2021

बर्फ का शिखर केदारकंठा

             







कोरोना काल में स्वप्नलोक की सैर


                        पहला भाग

            

     हर उम्र का अपना पड़ाव होता है, उसी में अपनी पसंद-नापसंद, रुचियों और शौक का वर्गीकरण कर, उसमें  वरीयता निश्चित कर जीने का नजरिया भी समय और अनुभव के साथ जुड़ता जाता है । थोड़ा पीछे की ओर देखूं तो ४० की उम्र खासी परिपक्व मानी जाती रही है । वैसे अब भी उम्र का ये दौर स्वभाव में परिपक्वता और जीवन में ठहराव को परिभाषित करता हुआ आगे बढ़ता है लेकिन खुद को देखती हूँ तो कुछ मैन्युफैक्चरिंग त्रुटि सी नजर आती  है । मन उतना ही चंचल है जितना २० साल पहले था और देशाटन की वही उत्सुकता जो बचपन में दादी या नानी के घर जाते हुए हुआ करती थी । वो कहते हैं न कि एक तो करेला ऊपर से नीम चढ़ा तो ठीक वैसे ही आर्थिक स्वतंत्रता ने इस भाव को कहीं से भी कम नहीं होने दिया बल्कि बढ़ाया ही है ।


    वैसे भी जीवन जब अपनी सहज गति से चलने लगता है तो मन अनायास ही अपनी अतृप्त किन्तु सुप्त कामनाओं की ओर खिंचने लगता है । और ये कामनाएं भी ऐसी जिनके बारे में मशहूर शायर ने कहा – “हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर खवाहिश पे दम निकले ।‘ यानी एक तमन्ना को पूरा करने में ही जीवन लग जाय । और यहां तो ढेर सारी अपूर्ण इच्छाएं । 


    सच कहूँ तो यह खुद के बुने मानसिक अवरोधों से निकलकर मुक्त होने और फिर से जीना शुरू करने की अवस्था का संकेत है । शुरुआत होती है जब मन में यह प्रश्न उठने लगता है  कि अब आगे क्या ? जीवन से जब हम इतनी अपेक्षाएं रखते हैं तो आखिर उसकी भी तो हमसे कुछ अपेक्षायें होती होंगी ! मन की ये ललक स्वाभाविक भी है सो मैं ही इसके आकर्षण या आक्रमण से कहाँ मुक्त हो पाती । पहले कभी संगीत सीखने की इच्छा हुआ करती थी तो जैसे ही थोड़ा अवकाश मिला उसकी कक्षाएं लीं, फिर तैराकी सीखने की इच्छा हुई तो तैराकी की कक्षाओं में जाना शुरू किया । (फिलहाल तो कोरोना ने इन सब पर अंकुश लगा रखा है) हाँ ! 


हां, एक यात्री की तरह अकेले घूमने की इच्छा तो हमेशा ही मन में कहीं दबी सी बची मिली । 


 भारत जैसे देश में जहाँ औरतों को सभ्यता और संस्कृति के नाम पर सामाजिक वर्जनाओं की लम्बी खुराक  जन्म के साथ ही घुट्टी की तरह पिलाई जाती हों वहां उसका घुमक्कड़ होना या उसके बारे में सोचना भी किसी विलासिता से कम नहीं । लेकिन जैसे घूमना हमेशा से मेरा प्रिय शगल रहा है वहीँ जहाँ चाह वहां राह की तरह अवसर भी मिलते गए । हालांकि विवाहोपरांत वे अधिकतर पारिवारिक टूर या नौकरी की जिम्मेदारियों को निभाने वाले ही रहे जिसमें वैसी स्वतंत्रता नहीं थी कि एक यात्री की तरह बेफिक्री से जगहों का अवलोकन हो सके लेकिन कहीं न कहीं उनसे, “कुछ नहीं से थोड़ा ही सही” वाली भावना की तुष्टि तो होती ही थी ।


    घर, स्कूल और परिवार की बंधी-बंधाई दिनचर्या में एकरसता और ऊब से बचने तथा काम के बोझ से तारोताजा होने को लगभग हर वर्ष गर्मी और सर्दी की छुट्टियों में कहीं न कहीं जाना होता ही रहा है । स्वाभाविक था इस बार भी कहीं न कहीं जाने की तैयारियां दो महीने पहले से ही थीं लेकिन लॉकडाउन के चलते इस बार योजना धरी की धरी रह गयी । वैसे भी कल का कोई अनुमान न होने पर भी हम अपने मनुष्यगत स्वभाववश बरसों की योजनायें बना कर चलते हैं । कल ये करना है, परसों वो, और बरसों बाद फलां काम, मानो जीवन के समस्त क्रिया-कलाप हमारी ही मुट्ठी में हों जबकि अधिकतर अपना सोचा कुछ भी नहीं होता । जीवन में उतार-चढ़ाव भी आते ही रहते है, लेकिन कोरोना जैसी अबूझ बीमारी से सहसा जनजीवन का थम जाना एक ऐसा अनुभव रहा जिसकी खट्टी-मीठी और सहमी यादें मानस पटल पर जीवन रहते तो अमिट ही रहेंगी ।


     किसने सोचा था कि एक-दो दिन, हफ्ते, महीने नहीं बल्कि पूरे साल को जीवन की गति रुक सी जायेगी और उस समय हमारे हिस्से में कुछ अच्छी बुरी घटनाओं की प्रतीक्षा और दुखद स्मृतियों पर विचार करने के अलावा कुछ ख़ास न होगा । जीवन का यूँ थमना बहुतों से बहुत कुछ छीन ले गया तो वहीँ ऐसा कुछ दे भी गया जिसके बारे में कम से कम मैंने तो सोचना छोड़ ही दिया था । 


     क्या कभी घर परिवार की चिंताओं से मुक्त हो अपने शौक को जी पाऊँगी या कभी दोबारा कुछ लिखने का भी सोचूंगी । अकेले कहीं साहसिक यात्राओं पर जाना संभव होगा ? वजह क्या कहूँगी घर में ? सब कहेंगे ऊब गयी हो क्या घर परिवार से ? लॉकडाउन में घर बैठे-बैठे ऐसे तमाम सवाल मन में उमड़ते-घुमड़ते रहते थे । स्वाभाविक था कि मानसिक रूप से रूढ़ियों में जकड़ी एक आम भारतीय औरत के लिए स्वयं की इच्छाओं को सबसे निचले पायदान पर रखना एक बेहद सामान्य बात, बल्कि सामाजिक मान्यता में यही उचित बात थी और मैं भी उससे अलग नहीं थी । 


    याद आता है कि शादी से पहले अफेयर के दिनों में प्रेमीगत स्वभाव के चलते संजय भी घूमने की योजनायें बनाते थे और नेताओं की तरह वादे करते थे कि सप्ताह के बाकी ५ दिन कहीं भी बिजी रहें वीकेंड पर साथ घूमेंगे । हालांकि शादी के बाद घर गृहस्थी की चक्की में पड़कर जब आटे दाल का भाव मालूम हुआ तो वादे इरादे सब ध्वस्त होते गए । शुरू के कुछ साल तो पारिवारिक जिम्मेदारियों में खुद की भूमिका समझने और निन्यानबे के फेर में निकल गए और फिर बच्चों की परवरिश और भविष्य की योजनाओं के मायाजाल में उलझ कर दिन बीतने लगे । हालांकि छोटी-मोटी यात्राएं की हमने लेकिन उसमें घुमक्कड़ी का भाव कम था ।

    

     घुमक्कड़ी के इसी शौक के चलते अपने कॉलेज के दिनों के मित्र और यूथ हॉस्टल की साकेत इकाई (अयोध्या) के सचिव अनूप मल्होत्रा की सलाह पर बरसों पहले यूथ हॉस्टल की सदस्यता भी ली थी लेकिन खुद की ओढ़ी जिम्मेदारियों से उबर कर कभी ट्रैकिंग जैसे आयोजनों में जाने का सोच ही नहीं पाती थी । 


     खतरनाक पहाड़ों पर, अज़नबी जगहों पर जाना वो भी अकेले ? दो एक साथी महिलाओं से बात भी की जिन्हें देख कर लगता था कि वे साथ चलने की हिम्मत जुटा सकती हैं लेकिन मामला वही ढाक के तीन पात वाला रहा, यानि बाहर कुछ और तथा भीतर से कुछ और । देखा जाय तो उनकी भी कोई गलती नहीं क्योंकि ये समस्या घर गृहस्थी या नौकरी में उलझी हर उस महिला की हो सकती है जिसने अभी खुद के साथ-साथ अपने शौक से प्रेम करना सीखने की शुरुआत भर की हो । अभी तो उसे सीखना है कि इस सुन्दर दुनिया में उसकी उपयोगिता घर की चारदीवारी के साथ ही उसके अपने मनोमय संसार में भी है जो उसके भीतर की रचनात्मकता को जीवंत रखता हो । 


     मेरी इन बातों का ये मतलब बिलकुल नहीं कि अपनी इच्छापूर्ति की लालसा में घर परिवार त्याग कर निकल पड़ा जाय लेकिन घूमना हो चाहे कोई भी अन्य रुचि, (जो अमूमन सबमें होती है) खुद को तरोताजा, सक्रिय तथा ऊर्जावान रखने को उसका पोषण जरूरी है । ये बात स्त्री-पुरुष दोनों पर बराबर लागू होती है, हाँ महिलाओं के लिए तो ये आवश्यकता तब और बढ़ जाती है जब वह घर परिवार के साथ ही बाहर की दुनिया में बराबर की सहभागिता करती है । क्रमशः.........💐


घुमक्कड़ भारती