सोमवार, 31 मई 2021

बर्फ का शिखर केदारकंठा

               

                         



 चौथी किश्त                           


         सुबह ७:३० पर हमें सांकरी के लिए निकलना था । रास्ता लम्बा था करीब ८-९ घंटे का, तो पिट्ठू बैग ऊपर ही रखा रास्ते में काम आने वाली छोटी-मोटी जरूरत की चीजों के साथ और बाकी सामान सूटकेस में जमा दिया था । बस सात बजे ही आ गयी तो सोनाली ने कहा कि चलकर पहले आगे की सीट ले लेते हैं वरना पीछे सीट मिलेगी और रास्ते में दिक्कत होगी । मुझे भी सही लगा तो अपने छोटे बैग हमने आगे की सीटों पर रख दिए तब नाश्ता करने गए । 

       नाश्ते में ब्रेड बटर, जैम ब्रेड, दलिया और उबले अण्डों के साथ चाय थी । सोनाली ने कहा कि अगर आपको नहीं खाना तो अंडे मुझे दे देना लेकिन ले जरूर लेना । मुझे हंसी आ गयी उसका अण्डों के लिए उतावलापन देखकर और ये भी समझ आया कि ये काम मुझे पूरे ट्रैक में करना है । मैंने अंडे उसे दिए और सिर्फ चाय पी क्योंकि आगे सफ़र में मैं उल्टी जैसी समस्या से बचना चाहती थी । मैंने उसे भी कहा कि ज्यादा कुछ न खाए लेकिन उसका कहना था कि उसे खासा अनुभव ऐसी यात्राओं का और उसे कोई दिक्कत नहीं होती । रास्ते में लंच के लिए पुलाव मिला जिसे सबने टिफ़िन में रखा तो मैंने भी थोड़ा रख लिया । गर्म पानी की बोतल भरी और बाकी सामान सहित बस तक आ गए । 

       सांकरी तक की यात्रा के लिए ७०० रुपये जमा करने थे जो उन्हीं सरदार जी के पास जमा किया । उनका चेहरा अब भी वैसा ही भावशून्य था लेकिन जब हमें पता चला कि इनकी सेवा हमारे साथ यहीं तक थी तो हमारे चेहरे जरूर चमक उठे । बेवजह उदास चेहरे मुझे डिप्रेस करने लगते हैं । और तो और मेरा खुद पर आत्मविश्वास ही डगमगाने लगता है कि क्या मुझमें ये भी क्षमता नहीं कि किसी के चेहरे पर मुस्कराहट ला सकूँ । फिर सोचती हूँ चल छोड़ यार, क्या पता वो व्यक्ति किसी परेशानी में हो और हमें न बता सकता हो । कंधे उचका कर आगे बस की ओर बढ़ती हूँ । सब धीरे-धीरे कर के सामान सहित बाहर निकल रहे हैं और मैं आँखों ही आँखों में उनके सामानों से अपने सामान की तुलना कर रही हूँ । खुश हूँ कि उनकी अपेक्षा मेरा समान फिर भी हल्का है । 

       बस में हमने पहले से ही अपनी पसंद की सीट पर छोटे बैग रख दिए थे तो जगह फिक्स थी । बस ड्राइवर और उसका सहयोगी सबके बड़े बैग, पीछे बस की डिग्गी में बड़े ही करीने से लगा रहे थे । जब अपना बैग सुरक्षित स्थान पर देख लिया मैंने तो बस के भीतर जाकर अपनी सीट पर जम गई । अपनी पसंद की एक किताब निकाली और उसी में सिर घुसा लिया । सोनाली बाहर अन्य लोगों से परिचय करने के अपने पसंदीदा काम में लग गई । ठीक साढ़े सात बस चल पड़ी । सफ़र कैसा और कोई भी हो चलते हुए सब जयकारा लगाना नहीं भूलते । मैं भी मन ही मन दोहराती हूँ “माधौ सकल काम साधौ” और सारी चिंताएं उस ऊपर वाले के हाथ सौंप कर निश्चिन्त हो जाती हूँ । अब मेरी चिंता ख़तम । 

       बस ड्राइवर बहुत अनुभवी हैं उन्होंने तमाम ट्रैक खुद भी किया है और न जाने कितने सालों से हम जैसे ट्रैकर्स को अपनी-अपनी मंजिलों तक पहुँचाया है तो ये भी हमारे लिए एक निश्चिन्तता की बात थी । सबके कहने पर उन्होंने बस में संगीत भी लगा दिया । मैं पढ़ते हुए बीच-बीच में अगल-बगल देख लेती हूँ । सब अपने-अपने जोड़ों में व्यस्त हैं । (जोड़े से मतलब स्त्री पुरुष नहीं ) बस अभी-अभी बालिग़ हुए चारों लड़कों का समूह कुछ बेचैन है । उन्हें वो संगीत पसंद नही आ रहा है और वे उसे बदलना चाहते हैं लेकिन ड्राइवर साहब उन्हें अपने केबिन में आने नहीं दे रहे तो वे गाना बंद करने को बोलते हैं । नहीं मानने पर शोर मचाते हैं  ड्राइवर भी जिद्दी है वॉल्यूम बढ़ा कर केबिन लॉक कर लेते हैं । 

       मुझे लगता है पहाड़ ही नहीं मैदानों में भी यात्रा के दौरान संगीत की व्यवस्था का जरूर उद्देश्य होता है जो निश्चित रूप से सिर्फ मनोरंजन तो नहीं होता । दिमाग को सक्रिय रखने में संगीत की महती भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता है । मज़े की बात ये कि संगीत सुलाने में भी प्रयोग होता है और जगाने में भी । अपने देश के शास्त्रीय संगीत में रागों की संकल्पना भी कितनी अद्भुत है । राग यमन जहाँ रात्रि विश्राम के लिए गाया जाता है वहीं राग भैरवी सुबह गाया जाने वाला राग । अब इसका मतलब ये बिल्कुल नहीं कि पाश्चात्य धुनों पर आधारित गीत संगीत बुरे हैं । वास्तव में सुरों के आरोहण और अवतरण के नियमों से ही संगीत की रचना होती है तो थोड़ा बहुत बदलाव होने पर भी संगीत, संगीत ही रहता है । आप भी सोच रहे होंगे कि यात्रा के बीच में मैं शास्त्रीय संगीत की चर्चा कहाँ से ले आयी और कहाँ की बात कहाँ लेकर चली गयी ।

         तो हुआ ये कि वो लड़के मन मसोसकर बैठ तो गये लेकिन उनके मन की भड़ास अस्फुट गालियों के रूप में बाहर आने लगी और जैसा कि भारत में सर्वविदित है गालियों के लिए महिलायें और बहनें ही सर्वथा सरलता से प्रयुक्त होती रही हैं तो यहाँ भी उनका ही आह्वान हो रहा था । हालाँकि आवाज धीमी थी या शायद हमारे होने की वजह से उन्होंने आवाज धीमी कर ली थी लेकिन काफी देर तक ड्राइवर का मजाक उड़ाते रहे, और भद्दे मजाक कर हंसते रहे । इन सबसे बाखबर या बेखबर ड्राइवर अपनी पूरी रौ में बस चलाता रहा । 

       मसूरी पीछे छूटता जा रहा था और हम उत्तरकाशी जिले में प्रवेश कर चुके थे । ऊँचे पहाड़ों और गहरी खाइयों की सुन्दरता पर जी का मिचलाना हावी हो रहा था । उससे बचने को मैंने किताब किनारे रख दी । एक घूँट पानी पिया और आँखे बंद कर लीं । धीरे-धीरे झपकी आने लगी । अचानक सोनाली ने मुझे जोर से झकझोर कर जगाया । खिड़की खोलने का इशारा करते हुये उसने अपने मुंह को हाथों से भींच रखा था । अचानक नींद खुलने से हड़बड़ाते हुए जैसे ही मैंने खिड़की खोली उसने खिड़की से सिर निकालकर सारा खाया पिया उलट दिया ।

मैं भौंचक्की सी अभी कुछ समझने का प्रयास कर ही रही थी तभी पीछे की सीट से किसी ने पानी की बोतल बढ़ायी । सोनाली ने हाथ मुंह साफ़ किया और अब खिड़की की ओर बैठने की इच्छा व्यक्त की । मन ही मन तो सोचा मैंने कि कह दूँ “सुबह कहा था मत खाओ ज्यादा । खुद पर बड़ा विश्वास था कि उल्टी नहीं होगी’ लेकिन चुप रही.....।  

       सीट पर भी कुछ छींटें पड़ गयी थी तो किसी ने उसे साफ़ करने को अख़बार का टुकड़ा बढ़ाया । तब मुझे एहसास हुआ कि हम एक समूह में हैं जहाँ आपस में बात होना जरूरी नहीं लेकिन सब में समूह में होने और एक-दूसरे की मदद का भाव है । मैं सरक कर किनारे की तरफ आ गयी और सोनाली ने खिड़की थोड़ी सी खोलकर उस पर अपना सिर टिका दिया । मैंने भी फिर से आँखे बंद कीं, अपना सिर उसी के कंधे पर टिका लिया और सोनाली जैसी स्थिति से बचने को फिर सोने की कोशिश करने लगी ।

       १० बजे बस उत्तरकाशी के ही किसी चौराहे पर रुकी जहाँ आधे घंटे का ब्रेक लिया   गया । खिली धूप में थोड़ी देर को हाथ पैर सीधे किये सबने । वहीँ एक ढाबेनुमा होटल में कुछ लोग नाश्ता करने लगे । मुझे वाशरूम जाने की जरूरत महसूस हो रही थी ।

ढाबे वाले से पूछा कि वाशरूम किधर है ? 

उसने सर ना में हिलाया और बोला – “हमारे यहाँ नहीं है ।”

      लो ये क्या बात हुयी ? वाशरूम तो आजकल छोटे से छोटे ढाबेवाले भी बनाकर रखते है क्योंकि चाय नाश्ते के अलावा इस नैसर्गिक आवश्यकता के चलते भी कस्टमर आते हैं । सोनाली किसी से बातें करने में व्यस्त थी तो सोचा थोड़ा आगे चलकर देखती हूँ शायद एकांत सी कोई जगह ही मिल जाए । सफ़र में ये एक बड़ा मुद्दा होता है । खुशकिस्मती से थोड़ा ही आगे जाने पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा ‘सुलभ शौचालय’ दिख गया । जान में जान आयी । बाथरूम बेहद साफ़ सुथरा था तो धन्यवाद देना बनता था उसके संचालक को और इसमें मैंने देर नहीं की । 

         बातों-बातों में ये जानकारी मिली कि सांकरी में कोई एटीएम जैसी सुविधा नहीं मिलेगी । वैसे तो मैं ज्यादा कैश ही लेकर आना चाह रही थी लेकिन पतिदेव का कहना था जब कार्ड से पेमेंट की सुविधा तो क्या जरूरत ज्यादा कैश लेकर चलने की, सो पैसे वापस रख दिए । वैसे भी आने-जाने की टिकट पहले से बुक थी । खाने-वाने का इंतजाम भी खुद को नहीं देखना था और बाकी एटीएम था ही तो निश्चिन्त थी । कुल तीन हजार रुपये पर्स में थे बाकी कुछ छुट्टे जिसमें से ७०० पहले ही किराए के लिए दे चुकी थी । बस वापसी का किराया देना था, फिर भी सामने एटीएम दिखा तो सोचा कुछ पैसे निकाल लूँ क्या पता कुछ खरीदने की ही इच्छा हो जाए या कोई जरूरत ही पड़ जाए । कई लोगों ने पैसे निकाले वहां तो जब तक मेरी बारी आई पैसे ख़त्म थे ।

      सोनाली ने भी पैसे निकाले थे और कहा जरूरत हो तो मुझसे ले लीजियेगा । मुझे भी ये आईडिया ठीक लगा कि अगर जरूरत पड़ी उससे लेकर उसे देहरादून पहुंचकर एटीएम से निकाल कर दे दूंगी, सोचते हुए ढाबे से एक कप चाय लेकर मैं बस में ही बैठकर पीने लगी । सोनाली चाय कम पीती थी तो मुझे अक्सर अकेले ही पीना पड़ रहा था । 

       एक-एककर सब बस में आ रहे हैं । एक-दूसरे को देखकर मुस्कुरा रहे हैं अपरिचय की सीमाएं टूट रही हैं यानि परिचय की शुरुआत हो गयी है । अपने राज्य या शहर के समूह से सब धीरे धीरे मुक्त हो रहे हैं । ये मुक्त होना ही वास्तव में असल यात्रा की शुरुआत है जब हम अपने आसपास बुने सुरक्षा और सुविधा के घेरे से निकलकर एक अनजानी दुनिया में सहजता से प्रवेश करने लगते हैं ।

     

       भारती पाठक

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