शुक्रवार, 21 मई 2021

बर्फ का शिखर केदारकंठा

             







कोरोना काल में स्वप्नलोक की सैर


                        पहला भाग

            

     हर उम्र का अपना पड़ाव होता है, उसी में अपनी पसंद-नापसंद, रुचियों और शौक का वर्गीकरण कर, उसमें  वरीयता निश्चित कर जीने का नजरिया भी समय और अनुभव के साथ जुड़ता जाता है । थोड़ा पीछे की ओर देखूं तो ४० की उम्र खासी परिपक्व मानी जाती रही है । वैसे अब भी उम्र का ये दौर स्वभाव में परिपक्वता और जीवन में ठहराव को परिभाषित करता हुआ आगे बढ़ता है लेकिन खुद को देखती हूँ तो कुछ मैन्युफैक्चरिंग त्रुटि सी नजर आती  है । मन उतना ही चंचल है जितना २० साल पहले था और देशाटन की वही उत्सुकता जो बचपन में दादी या नानी के घर जाते हुए हुआ करती थी । वो कहते हैं न कि एक तो करेला ऊपर से नीम चढ़ा तो ठीक वैसे ही आर्थिक स्वतंत्रता ने इस भाव को कहीं से भी कम नहीं होने दिया बल्कि बढ़ाया ही है ।


    वैसे भी जीवन जब अपनी सहज गति से चलने लगता है तो मन अनायास ही अपनी अतृप्त किन्तु सुप्त कामनाओं की ओर खिंचने लगता है । और ये कामनाएं भी ऐसी जिनके बारे में मशहूर शायर ने कहा – “हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर खवाहिश पे दम निकले ।‘ यानी एक तमन्ना को पूरा करने में ही जीवन लग जाय । और यहां तो ढेर सारी अपूर्ण इच्छाएं । 


    सच कहूँ तो यह खुद के बुने मानसिक अवरोधों से निकलकर मुक्त होने और फिर से जीना शुरू करने की अवस्था का संकेत है । शुरुआत होती है जब मन में यह प्रश्न उठने लगता है  कि अब आगे क्या ? जीवन से जब हम इतनी अपेक्षाएं रखते हैं तो आखिर उसकी भी तो हमसे कुछ अपेक्षायें होती होंगी ! मन की ये ललक स्वाभाविक भी है सो मैं ही इसके आकर्षण या आक्रमण से कहाँ मुक्त हो पाती । पहले कभी संगीत सीखने की इच्छा हुआ करती थी तो जैसे ही थोड़ा अवकाश मिला उसकी कक्षाएं लीं, फिर तैराकी सीखने की इच्छा हुई तो तैराकी की कक्षाओं में जाना शुरू किया । (फिलहाल तो कोरोना ने इन सब पर अंकुश लगा रखा है) हाँ ! 


हां, एक यात्री की तरह अकेले घूमने की इच्छा तो हमेशा ही मन में कहीं दबी सी बची मिली । 


 भारत जैसे देश में जहाँ औरतों को सभ्यता और संस्कृति के नाम पर सामाजिक वर्जनाओं की लम्बी खुराक  जन्म के साथ ही घुट्टी की तरह पिलाई जाती हों वहां उसका घुमक्कड़ होना या उसके बारे में सोचना भी किसी विलासिता से कम नहीं । लेकिन जैसे घूमना हमेशा से मेरा प्रिय शगल रहा है वहीँ जहाँ चाह वहां राह की तरह अवसर भी मिलते गए । हालांकि विवाहोपरांत वे अधिकतर पारिवारिक टूर या नौकरी की जिम्मेदारियों को निभाने वाले ही रहे जिसमें वैसी स्वतंत्रता नहीं थी कि एक यात्री की तरह बेफिक्री से जगहों का अवलोकन हो सके लेकिन कहीं न कहीं उनसे, “कुछ नहीं से थोड़ा ही सही” वाली भावना की तुष्टि तो होती ही थी ।


    घर, स्कूल और परिवार की बंधी-बंधाई दिनचर्या में एकरसता और ऊब से बचने तथा काम के बोझ से तारोताजा होने को लगभग हर वर्ष गर्मी और सर्दी की छुट्टियों में कहीं न कहीं जाना होता ही रहा है । स्वाभाविक था इस बार भी कहीं न कहीं जाने की तैयारियां दो महीने पहले से ही थीं लेकिन लॉकडाउन के चलते इस बार योजना धरी की धरी रह गयी । वैसे भी कल का कोई अनुमान न होने पर भी हम अपने मनुष्यगत स्वभाववश बरसों की योजनायें बना कर चलते हैं । कल ये करना है, परसों वो, और बरसों बाद फलां काम, मानो जीवन के समस्त क्रिया-कलाप हमारी ही मुट्ठी में हों जबकि अधिकतर अपना सोचा कुछ भी नहीं होता । जीवन में उतार-चढ़ाव भी आते ही रहते है, लेकिन कोरोना जैसी अबूझ बीमारी से सहसा जनजीवन का थम जाना एक ऐसा अनुभव रहा जिसकी खट्टी-मीठी और सहमी यादें मानस पटल पर जीवन रहते तो अमिट ही रहेंगी ।


     किसने सोचा था कि एक-दो दिन, हफ्ते, महीने नहीं बल्कि पूरे साल को जीवन की गति रुक सी जायेगी और उस समय हमारे हिस्से में कुछ अच्छी बुरी घटनाओं की प्रतीक्षा और दुखद स्मृतियों पर विचार करने के अलावा कुछ ख़ास न होगा । जीवन का यूँ थमना बहुतों से बहुत कुछ छीन ले गया तो वहीँ ऐसा कुछ दे भी गया जिसके बारे में कम से कम मैंने तो सोचना छोड़ ही दिया था । 


     क्या कभी घर परिवार की चिंताओं से मुक्त हो अपने शौक को जी पाऊँगी या कभी दोबारा कुछ लिखने का भी सोचूंगी । अकेले कहीं साहसिक यात्राओं पर जाना संभव होगा ? वजह क्या कहूँगी घर में ? सब कहेंगे ऊब गयी हो क्या घर परिवार से ? लॉकडाउन में घर बैठे-बैठे ऐसे तमाम सवाल मन में उमड़ते-घुमड़ते रहते थे । स्वाभाविक था कि मानसिक रूप से रूढ़ियों में जकड़ी एक आम भारतीय औरत के लिए स्वयं की इच्छाओं को सबसे निचले पायदान पर रखना एक बेहद सामान्य बात, बल्कि सामाजिक मान्यता में यही उचित बात थी और मैं भी उससे अलग नहीं थी । 


    याद आता है कि शादी से पहले अफेयर के दिनों में प्रेमीगत स्वभाव के चलते संजय भी घूमने की योजनायें बनाते थे और नेताओं की तरह वादे करते थे कि सप्ताह के बाकी ५ दिन कहीं भी बिजी रहें वीकेंड पर साथ घूमेंगे । हालांकि शादी के बाद घर गृहस्थी की चक्की में पड़कर जब आटे दाल का भाव मालूम हुआ तो वादे इरादे सब ध्वस्त होते गए । शुरू के कुछ साल तो पारिवारिक जिम्मेदारियों में खुद की भूमिका समझने और निन्यानबे के फेर में निकल गए और फिर बच्चों की परवरिश और भविष्य की योजनाओं के मायाजाल में उलझ कर दिन बीतने लगे । हालांकि छोटी-मोटी यात्राएं की हमने लेकिन उसमें घुमक्कड़ी का भाव कम था ।

    

     घुमक्कड़ी के इसी शौक के चलते अपने कॉलेज के दिनों के मित्र और यूथ हॉस्टल की साकेत इकाई (अयोध्या) के सचिव अनूप मल्होत्रा की सलाह पर बरसों पहले यूथ हॉस्टल की सदस्यता भी ली थी लेकिन खुद की ओढ़ी जिम्मेदारियों से उबर कर कभी ट्रैकिंग जैसे आयोजनों में जाने का सोच ही नहीं पाती थी । 


     खतरनाक पहाड़ों पर, अज़नबी जगहों पर जाना वो भी अकेले ? दो एक साथी महिलाओं से बात भी की जिन्हें देख कर लगता था कि वे साथ चलने की हिम्मत जुटा सकती हैं लेकिन मामला वही ढाक के तीन पात वाला रहा, यानि बाहर कुछ और तथा भीतर से कुछ और । देखा जाय तो उनकी भी कोई गलती नहीं क्योंकि ये समस्या घर गृहस्थी या नौकरी में उलझी हर उस महिला की हो सकती है जिसने अभी खुद के साथ-साथ अपने शौक से प्रेम करना सीखने की शुरुआत भर की हो । अभी तो उसे सीखना है कि इस सुन्दर दुनिया में उसकी उपयोगिता घर की चारदीवारी के साथ ही उसके अपने मनोमय संसार में भी है जो उसके भीतर की रचनात्मकता को जीवंत रखता हो । 


     मेरी इन बातों का ये मतलब बिलकुल नहीं कि अपनी इच्छापूर्ति की लालसा में घर परिवार त्याग कर निकल पड़ा जाय लेकिन घूमना हो चाहे कोई भी अन्य रुचि, (जो अमूमन सबमें होती है) खुद को तरोताजा, सक्रिय तथा ऊर्जावान रखने को उसका पोषण जरूरी है । ये बात स्त्री-पुरुष दोनों पर बराबर लागू होती है, हाँ महिलाओं के लिए तो ये आवश्यकता तब और बढ़ जाती है जब वह घर परिवार के साथ ही बाहर की दुनिया में बराबर की सहभागिता करती है । क्रमशः.........💐


घुमक्कड़ भारती 

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