शनिवार, 29 मई 2021

बर्फ का शिखर केदारकंठा यात्रा भाग 3


 कोरोना काल में स्वप्नलोक की सैर

                         



         पहले भी कई बार मसूरी जाना हुआ है लेकिन तब परिवार के साथ थी तो बस कोई कार बुक करके चले जाते थे हम लेकिन इस बार अकेले के लिए कार बुक करना खर्चीला लगा मुझे तो सोचा बस से चलती हूँ । ड्राइवर से पूछा कि मसूरी के लिए बस कहाँ मिलेगी तो बोला ५०० मीटर पर ही बस अड्डा है वहां चली जाइए लेकिन इस समय बस मिलना मुश्किल है । सोच में पड़ गयी कि क्या करूँ ? किससे पूछूं, तभी अपने हॉस्टल टाइम की फ्रेंड दीपा का ख़याल आया जो देहरादून में ही रहती थी । उसे फोन मिलाया कि मसूरी के लिए बस मिलेगी या नहीं और मिलेगी तो कहाँ से ।

        अब आप ये सोच रहे होंगे कि साधन तो बहुत हैं मसूरी जाने के । कोई भी कार रिज़र्व कर लो और चले जाओ लेकिन एक ट्रैकर और सामान्य पर्यटक में ये भी अंतर कि ट्रैकर कम से कम पैसे में अपनी मंजिल तय करता है तो मुझपर फिलहाल ट्रैकर होने का नशा चढ़ा था और उसी तरह जाना था या कम से कम जाने का प्रयास तो करना ही था । आखिरी आप्शन तो कार का था ही । दीपा से बात हुई तो बोली तुम जहाँ हो वहां की लोकेशन भेजो मेरा भाई भी अपनी स्कूटी से मसूरी जा रहा तुम्हे भी लेता जायेगा । बस ये वादा करो कि वापसी में मिलकर ही जाओगी । ये तो यूँ हुआ मानो सोने पर सुहागा यानि फ्री की लिफ्ट ।

        लेकिन स्कूटी से मसूरी ? मुझे भी एक बारगी लगा कैसे ? फिर एडवेंचर का कीड़ा दिमाग में कुलबुलाया तो मन को मनाया । लोकेशन भेजा तो उसका भाई थोड़ी ही देर में मेरे सामने था । उसने मेरा ट्राली बैग आगे पैरों के पास रखा और मुझे पीछे आराम से बैठने को कहा और चल पड़ी मैं इस अचानक तय की सवारी के साथ अपने पहले पड़ाव की ओर । दीपा और मेरा साथ करीब साल भर का था जब हॉस्टल में हम थे । हालांकि वो दूसरे कमरे में रहती थी और उसकी रूममेट दूसरी लड़की थी लेकिन हम दोनों स्पोर्ट्स से जुड़े थे तो दोस्ती गहरी हो गयी थी । 

        हम रास्ते में कई जगह रुकते हुए गए क्योंकि इस तरह चढ़ाई पर स्कूटी के पीछे बैठना निश्चित रूप से आरामदायक नहीं था । एक वजह और थी कि मेरा छोटा पिट्ठू बैग भी कंधे पर था जो दिक्कत कर रहा था । दूरी कुल ३५-३६ किलोमीटर की थी जो हम मैदान में रहने वालों के लिहाज से खास नहीं थी लेकिन चढ़ाई पर ये बहुत होती है । ये तो अच्छा हुआ कि मुझे जहाँ पहुँचना था वो जगह मसूरी से ७ किलोमीटर पहले ही एकदम सड़क से लगी हुई थी । जान में जान आई जब करीब घंटे भर में हम यूथ हास्टल के सामने खड़े थे । भाई (मेरे नहीं दीपा के ) को थैंक्स बोल कर विदा किया और सामान लेकर थोड़ी देर बाहर ही खड़े होकर मौसम का जायजा लेते हुए पीठ सीधी की । सारे रास्ते पीछे की तरफ झुके-झुके हालत ख़राब हो गयी थी । हालांकि उल्टी या चक्कर जैसी कोई समस्या जरा भी महसूस नहीं हुई ।  

       सड़क से लगा हुआ मसूरी यूथ हॉस्टल मुख्य शहर से एकदम अलग-थलग सा है । आसपास कोई आबादी नही थी इक्का-दुक्का छोटी दुकानों को छोड़कर, वो भी कुछ दूर चलने पर । मुख्य द्वार के बाद बायीं तरफ लोहे की रेलिंग बनी थी जिसके नीचे गहरी खाई । रेलिंग के पास ही कुछ मेरी ही तरह के ट्रैकर ठंडी हवा के मज़े ले रहे थे । मोबाइल में तापमान देखा तो माइनस १ डिग्री था । ठीक सामने कांच का दरवाजा जिससे आर पार दिख रहा था कि अन्दर क्या है । दरवाजा खुला ही था जहाँ लगे सोफे पर एक सरदार जी तमाम कागज पत्रों के साथ उलझे थे । उम्र कोई ३५-३६ की रही होगी, सुगठित शरीर और साफ़ रंग जो पहली ही नज़र में किसी को भी प्रभावित कर दे । मैंने अपना सामान किनारे रखा और उन्ही से मुस्कुराकर पूछा- “केदारकंठा ट्रैक की रिपोर्टिंग यही करनी है ?” 

      “जी ! अपना एडमिट कार्ड और मेडिकल दीजिये और ये फॉर्म भर दीजिये ।” एक खोखली सी आवाज सुनाई दी । 

        बोलते हुए उनका चेहरा इतना सपाट और भावशून्य लगा कि जैसे हिमालय से सीधा पधारे कोई महात्मा जो मोक्ष को प्राप्त कर चुके हों । न मुस्कराहट, न गुस्सा, घनघोर प्रोफेशनल की तरह सीधी सपाट अभिव्यक्ति । मन थोड़ा बुझ सा गया कि क्या इनके साथ हमें ८ दिन बिताने हैं ? हे भगवान् ! मन ही मन सोचा मैंने कि अच्छा हुआ कुछ खास प्रभावित नहीं हुई थी, फिर बेफिक्री से कंधे उचकाये कि मुझे क्या, और जरूरी कागज़ जिस भाव से उनकी ओर बढ़ाये उसी भाव से उन्होंने उसे देखा और एक फॉर्म भरने के लिए दिया । फॉर्म भर कर उन्हें दिया तो उसे रखकर बाकी कागज मुझे वापस देते हुए बोले कि इसे सांकरी में रजिस्ट्रेशन के समय जमा कीजिये । पास ही रखे रजिस्टर की ओर इशारा कर बोले – इसमें अपनी एंट्री कर दीजिये । कथा का ये अध्याय वहीँ ख़त्म । 

        वहां एंट्री के बाद दाहिनी ओर बने रिसेप्शन काउंटर पर भी एंट्री की जहाँ खड़े कर्मचारी के मुस्कराहट भरे स्वागत से मन को थोड़ी राहत मिली । 

“आप कहाँ से आयी हैं ?” उसने मुस्कुराकर पूछा । 

“अयोध्या से ।” मैंने भी हंसकर जवाब दिया ।

“अरे वाह ! रामजी की नगरी से ।” वह चहकते हुए बोला । धन्य हो राम जी और धन्य आपकी अयोध्या जो कहीं भी जाने पर नाम लेते ही हमें विशेष महसूस करा देते हैं । मन ही मन बुदबुदाई ।

         राम मंदिर का हाल चाल पूछते हुए उसने मुझे कमरा नंबर बताया और रास्ता दिखाते हुए थोड़ी देर में चाय के लिए डाइनिंग हाल में आने को बोला । सच कहूँ मुझे तो मुस्कराहट से बड़ा और कोई परिचय लगता ही नहीं । मन में कैसी भी तल्खी हो तुरंत घुल जाती है । चाय का तो नाम सुनकर वैसे भी राहत मिल  गयी ।

        रिसेप्शन से नीचे कुछ सीढ़ियाँ उतर कर बाएँ तरफ का आखिरी कमरा था जिसमें उस रात रुकना था और अपने दूसरे साथियों से मुलाक़ात होनी थी । कमरा खासा बड़ा किसी डॉरमेटरी जैसा था जिसमें करीब दस बेड लगे थे । किनारे सामान रखने के लिए आलमारियाँ बनी थी । सामान तीन बिस्तरों पर रखा था लेकिन खिड़की से लगे बेड पर एक ही लड़की बैठी फोन पर किसी से बात कर रही थी । उसी के बगलवाले बेड पर मैंने अपना सामान रखा । मुस्कराहट भरे अभिवादन और नामों का आदान प्रदान हुआ । 

        इस तरह सोनाली से मेरी पहली मुलाक़ात हुई । सोनाली उड़ीसा से थी लेकिन नौकरी गुजरात में और शादी गुजराती से हुई थी तो फिलहाल गुजरात में सेटेल्ड थी सो वहीँ से आई थी । उड़ीसा उसकी जन्मभूमि थी तो उसे वहीँ का होना कहलाना ही पसंद था और गुजरातियों का अत्यधिक वाणिज्यिक स्वभाव नापसंद । उसे साहसिक यात्रायें करना पसंद था और वो काफी सालों से ट्रैकिंग कर रही थी तो उसे काफी अनुभव भी था । ये बात उसका पिट्ठू बैग देखने से ही पता चल रही था जो छोटा सा था । उसके पति से उसकी मुलाक़ात भी किसी ट्रेकिंग के दौरान ही हुई थी फिर दोस्ती, प्यार और काफी साल तक दोनों के परिवारों को मनाने की जद्दोजहद के बाद अंतत शादी । 

        शादी को दो साल हुए थे लेकिन पारंपरिक शादीशुदा औरतों जैसे कोई लक्षण न शरीर पर थे न उसके मन पर । सोनाली को मेरी फिटनेस ने प्रभावित किया जबकि वो खुद भी फिट थी और मुझे उसके व्यवहार ने । वो बरसों से इस तरह की यात्राएँ करती आ रही थी और प्रभावित होने की बात थी कि शादी के बाद भी उसके पति का कहना था कि साथ में ट्रैकिंग के अलावा भी दोनों को एक-एक सोलो ट्रैक जरूर करनी है । अच्छा लगा मुझे उससे मिलकर ।

        साधारणतः कोई स्वयं पहल न करे तो मुझे किसी से घुलने मिलने में समय लगता है । मुझे खुद का साथ ही ज्यादा पसंद है । किसी से बिना उसके स्वयं बताये कुरेद-कुरेद कर जानकारी लेना और मतलब रखना सख्त नापसंद मुझे, इसके अलावा मेरा स्वभाव थोड़ा शक्की होने के साथ–साथ झेंपू भी है कि किसी से मिलने पर उसका चेहरा और मन पढ़ने की कोशिश और अनुमान लगाने में ही सारा समय बीत जाता है । सोनाली की पहल से ये तो पक्का था कि हमारी दोस्ती होनी है और हो भी गयी । अनजान जगह पर ऐसे किसी साथी का मिलना कितना सुकून भरा हो सकता है मैं महसूस कर रही थी । 

        सफ़र की थकान उतारने को मैं नहाना चाहती थी तो सोनाली से बाथरूम के बारे में पूछा । बाथरूम बिलकुल हमारे कमरे के बगल में ही था । सोनाली ने खुद जाकर गीजर ऑन कर दिया और बोली – “गर्म पानी से नहाइए यहाँ ठण्ड ज्यादा है ।” सच कहूँ तो उसका मेरी परवाह करना अच्छा लगा मुझे । जब तक पानी गर्म हुआ हमने ढेरों बातें की । कुछ अपने शौक और घुमक्कड़ी को लेकर तो कुछ घर परिवार की, कुछ नौकरी की बाध्यताओं की भी जिसके चलते घुमक्कड़ी में अनचाही बाधा आती है । बातों में कितना ही समय बीत गया तो याद आया कि पानी कब का गरम हो चुका होगा । मैं नहाने चली गयी और सोनाली फ़ोन में व्यस्त हो गयी ।

        नहाकर बाथरूम से निकली ही थी कि रसोइया आ गया चाय के लिए बुलाने । मन में आया – अरे वाह ‘नेकी और पूछ पूछ’ शायद इसे ही कहते होंगे । सुबह ८ बजे चाय पी थी उसके बाद से मौका ही नहीं मिला था कहीं रूककर कुछ खाने-पीने का । जल्दी से कपड़े बदले और हम दोनों ही डाइनिंग हाल में सबसे पहले पहुंचे लेकिन दोनों ही चाय पीने को साथ में गिलास ले ही नहीं गए थे तो रसोई में जाकर गिलास माँगा और चाय लेकर अपनी कुर्सियों पर जम गए । डाइनिंग हाल इतना बड़ा था कि ४०-५० लोग एक साथ बैठकर खाना नाश्ता कर सकें । थोड़ी देर में बाकी सब भी आ गए । अधिकतर लोग ४-५ के समूहों में आये थे । सबसे कम उम्र के लड़कों का एक ग्रुप था जो बस बालिग़ हुए ही थे और सबसे ज्यादा उम्र के दो व्यक्ति करीब ५२-५५ साल के । उन्होंने अपने-अपने समूह में बैठ कर ही चाय पी और आपस में बातें करते रहे । सोनाली बेचैन थी ये जानने को कि हमारे ग्रुप में कौन-कौन है लेकिन उन सबके अपने आप में मगन होने से वो थोड़ी बुझ सी गयी । 

        “लगता है इनमे से अधिकतर पहली बार ट्रैकिंग वाले हैं तभी एकदूसरे से बात भी नहीं कर रहे, न परिचय करने की कोशिश ही ।” वह मेरे कान के पास आकर फुसफुसाई ।

      “अरे यार ! अभी तो आये हैं सब, थके होंगे धीरे धीरे साथ रहने से परिचय हो ही जायेगा ।” कहते हुए मैं मन ही मन खुश हो रही थी कि अच्छा ही है कोई ज्यादा बात न करे । 

        उसने बताया कि पहले के ट्रैक्स में ऐसा होता आया है कि एक छोटी सी मीटिंग होती है जब सभी सदस्यों का एक दूसरे से परिचय कराया जाता है । उसे लगा कि शायद अभी न होकर रात के खाने पर सबसे परिचय कराया जाय ।

 चाय का गिलास धो कर हमने रसोई में लौटा दिया और आगे गिलास मांगने की समस्या से बचने को हम दोनों बाजार की ओर निकले कि कोई स्टील का मग खरीद लें । करीब एक किलोमीटर चलने के बाद भी छिटपुट चीजों जैसे चिप्स, कुरकुरे, चाय आदि के अलावा कोई और दुकान नहीं दिखी । पता चला ये मसूरी का बाहरी इलाका है और बाज़ार यहाँ से काफी दूर है । ऐसे अवसरों पर अपने मैदानी शहर बड़े काम के लगते हैं जहाँ ऑटो या रिक्शा की सुविधा होती है कि पलभर में जाकर सामान ले आते । यहाँ तो ऐसी कोई सुविधा नहीं दिख रही थी । चूँकि शाम हो चली थी और थकान भी थी तो हमने आगे सांकरी पहुंचकर गिलास खरीदने का इरादा किया और हॉस्टल वापस लौट आये । 

        कमरे में पहुंचे तो जिनके सामान बिस्तर पर रखे थे वो दोनों लड़कियाँ भी आ चुकी थीं । आपस में परिचय का आदान-प्रदान हुआ । पहली थी अश्वी जो अपने मंगेतर के साथ आयी थी । स्वाभाविक था उसे और किसी के साथ की जरूरत बिलकुल नहीं थी । वो और उसका मंगेतर एक ही फ़र्म में काम करते थे तो हमने कयास लगाया कि लव मैरेज का मामला होगा जबकि उसका कहना था कि शादी घर वालों की मर्जी से तय हुई है । दूसरी थी सलोनी जो अपने दोस्तों के साथ आयी थी । 

        हालांकि सलोनी ने बताया कि गुजरात में लड़कियों को इस तरह लड़कों के साथ माता-पिता कहीं बाहर जल्दी नहीं भेजते लेकिन उसकी इच्छा के आगे उसके मम्मी पापा मान गए थे । देखने में खूबसूरत सलोनी उतनी ही नाजुक मिजाज लेकिन कुछ रिज़र्व सी लगी । ठण्ड जरूर थी लेकिन जिस तरह उसने खुद को ऊपर से नीचे तक जैकेट और जुराबों से ढँक रखा था मुझे तो उसे देख कर गर्मी लग रही थी । हाँ दोनों में, नहीं बल्कि तीनों में एक बात कॉमन थी कि वे गुजरात से आयी थीं तो बीच-बीच में गुजराती में भी बातें करती थीं जिन्हें समझना बहुत मुश्किल नहीं था ।

        कुछ देर अपने काम-काज और घर-परिवार की बातें करके सब अपने-अपने कामों में लग गए । ये तो तय हो गया था कि इस ग्रुप में हम चार ही लड़कियाँ हैं और साथ भी लगभग तय ही था । मैं सोनाली के साथ और सलोनी अश्वी के साथ । रात के खाने के समय भी परिचय जैसी कोई बात नहीं हुई बस इतना कहा गया कि सबको सुबह ७ बजे नाश्ता करके और लंच लेकर बाहर मिलना है । 

        रात थके होने से अच्छी नींद आई । हालांकि सर्दी बहुत थी और हमने दो-दो रजाइयां ओढ़ी थीं । सुबह ५ बजे ही आँख खुल गयी । सुबह की पहली चाय नहाकर पी । सामान खुला पड़ा था तो समेटने बैठी । एक बात मुझे आजतक समझ नहीं आयी कि कहीं यात्रा पर जाने के लिए जब हम पैकिंग करते हैं तब तो सामान सूटकेस में अच्छे से समा जाता है और थोड़ी जगह भी बच जाती है । एक बार उसे खोलकर सामान निकालने पर दोबारा ठीक से बंद क्यों नहीं होता या सामान बढ़ कैसे जाता है । कई बार सामान को निकाला-रखा तब जाकर चेन बंद हुई ।


        भारती पाठक

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